उठो युवा | रक्षा-कवच | अटेंशन का पहरा | मर्यादा की दीवार!!!

उठो युवा !!!


माया की 1000 चालों को मात देने वाले, सोने की लंका की चकाचौंध से, चतुरसुजान बन साफ़ निकलने वाले, रावण के हर लुभावने आकर्षण से उपराम रहने वाले, टी.वी., फिल्मों, विकारों की संक्रामक जाल से स्वयं को बचाने वाले, संबंधों की सुनहरी रस्सी के फंदों से मुक्त रहने वाले, धन एवं साधनों की इच्छाओं रुपी सुरसा के खतरनाक वारों से सुरक्षित रहने वाले, समस्याओं को समाधान में बदलने वाले, विघ्नों की कालिमा को ज्ञानसूर्य की रोशनी से दूर करने वाले, गृहस्थी की तंग गलियों और मान्यताओं की पगडंडियों को छोड़ निर्बंधन हाईवे पर चलने वाले, नाम-मान-शान की बैशाखी का त्याग कर स्वमान के रॉकेट  में उड़ने वाले, त्याग-तपस्या का आसन ले, वैराग का व्रत धारण कर, सेवा द्वारा तीव्र पुरुषार्थ करने वाले मेरे प्रिय युवा भाइयों, उठो........ अपने वो कार्य किया है जिसे लोग 60 वर्ष के बाद करने की  सोचते हैं। पर मेरे भाइयों, जो त्याग का बीज अपने डाला था, क्या वह अंकुरित हुआ? क्या वैराग्य की चमक अभी भी दृष्टिगोचर है? जो अग्नि आपने जलाई थी,वो अभी भी प्रज्वलित है? मेरे भाई, आप वैराग्य का छंद हो, तपस्या का प्रचण्ड कुंड हो, सेवाओं की मज़बूत धुरी हो, पहचानो अपने आप को। आपकी ज़िंदगी उधार की है, आपकी सांस समय की कच्ची डोर में नहीं बंधी है, आप भारत के उज्जवल भविष्य हो, अपनी गरिमा को गे गे की चदर में मत लपेटो। समय का गणित मत लगाओ, विज्ञानं के अँधेरे में आध्यात्म के प्रकाश को मत छिपाओ, ब्याज से जीवन नहीं चलता, अब उठाओ हिम्मत का गाण्डीव और जरा सामने देखो,दिव्य जीवन के कर्मक्षेत्र में कौन-कौन युद्ध के लिए खड़े हैं?

रक्षा-कवच 

यह अलौकिक जीवन है, कोई प्रोफेशन नहीं है। आप सिर्फ ज्ञान सुनाने वाले नहीं हो कि सेवा पूरी हुई, संगठन से निकले, स्टेज से उतरे तो चाल-ढाल, रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, उठना-बैठना सब बदल जाये। प्रोफेशन में ड्यूटी पूरी होते ही कपड़े बदल जाते हैं, हर क्रियाकलाप बदल जाता है पर जो जीवन ही है वह कैसे बदलेगा? हम किसी और को धोखा दे सकते हैं पर अपने आपको परमात्मा को नहीं। जिसको नंबर देने हैं उसको सब पता है,जिसको नंबर मिलने है उसको सच पता है, तो फिर तीसरे के पता होने या न होने का कोई अर्थ ही नहीं है। जो भी बाबा ने नियम-धारणाएं बताई हैं उन्हीं में हमारा फायदा है। आप एक जिम्मेदार सिपाही हो, विश्व की स्टेज पर हो, सारा जहान आपको देख रहा है, दुश्मन भी चारों ओर से मुस्तैदी से वार करने के लिए तैयार है, अँधेरा नहीं है पर आप अपनी आँखें मत बंद करो, निश्चय के उजाले में परिस्थितियों का पथ भी सुगमता से पार हो जाता है। उठो! अपने कर्तव्य को फिरसे देख लो, पहचान लो अपने लक्ष्य को, निहारे ज़रा ध्यान से अपनी मंज़िल को, छूना है आपको आकाश को, पाना है आपको सदाकाल की सफलता को,हराना है आपको आधाकल्प के शक्तिवान रावण को। रावण दुश्मन रूप बदलता है, वो बाहर से नहीं, अंदर से आता है। ऐसा रूप रखता है जैसे कि मर गया हो पर होता वो  बेहोश है परन्तु आप भी त्रिनेत्री व त्रिकालदर्शी हो, बाहर-बाहर से मत देखो, फिर दुश्मन कहीं भी छिपा होगा तो भी आपकी नज़र से बच नहीं सकेगा, इसके लिए निम्नलिखित रक्षा-कवच धारण करो। 

अटेंशन का पहरा 

अटेंशन को पहरे की तरह रखो तो आलस्य, सुस्ती, लापरवाही, टालमटोल, बहानेबाजी आदि दुश्मन से दूर से ही नमस्कार करेंगे और हमेशा चुस्त, फुर्त, तरोताज़ा रहने के कारण उमंग-उत्साह साथ रहना शुरू कर देंगे। इससे हर कार्य नवीनता के साथ रुचिकर होगा और सफलता के साथ मंज़िल पर अति शीघ्र कदम होंगे। जीवन भर के टेंशन से फ्री रहने के लिए व संसार का टेंशन न बनने के लिए अटेंशन का पहरा देना ही पड़ेगा। अटेंशन अगर पहरे की तरह जीवन का एक संस्कार बन जाये तो प्रगति का पथ प्रकाशित होता रहेगा। प्रगति प्रयत्न का ही फल है। अटेंशन के पहरे में अलर्टनेस की सीटी और साथ में एक्टिवनेस का छोटा-सा डंडा भी साथ हो तो हर मंज़िल सहज ही क़दमों में होती है। जगह-जगह लिखा होता है, सावधानी हटी-दुर्घटना घटी। रास्ते कोई भी हों, अटेंशन अनिवार्य है, नहीं तो दुर्घटना से बचना मुश्किल होगा। राहें ,मंज़िलें नहीं होती, राहें तो मंज़िल तक ले जाने वाली होती हैं। हमें रास्तों पर भटकना नहीं है। जैसे जब गाँधी जी लॉ की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए थे, तो वहाँ के वकीलों को देखकर तय किया कि हमें भी अच्छा वकील बनना है, तो एक अच्छे वकील के लिए तो लम्बे बाल रखना और डांस सीखना अनिवार्य है। इसके कारण गाँधी जी ने न सिर्फ अपने बाल काफी लम्बे किये बल्कि डांस भी सिखने लगे। बाद में उन्हें यह समझा आ गया कि ये ठीक नहीं है, यह है रास्ते पर भटकना। जिस पथ पर अपने चलने का सोचा है वहाँ आकर्षणों की कई प्रकार  फिसलन व विकर्षणों की रपटनें हो सकती हैं। गीता में कहा गया है कि जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तब- तब मैं आता हूँ। अब गौर से देखा जाए तो आज अगर  कोई झूठ न बोले, ईमानदारी से चले तो लोग उस पर ताने मारते हैं, उसकी उपेक्षा करते हैं, उसके काम में बाधा पहुँचाते हैं, उसकी निंदा करते हैं, ये धर्म ग्लानि ही तो है। दूसरी बात, कोई चाहे जिस भी प्रकार नैतिक-अनैतिक तरीके से धन का स्वामी है, उसे लोग बड़ा आदमी  मान कर सम्मान देते हैं, ये धर्म ग्लानि ही तो है। ऐसे समय पर हर कदम पर अटेंशन चाहिए क्योंकि अधर्म का विनाश सिर्फ परमात्मा ही कर सकते हैं परन्तु अधर्म में लिप्त होने से स्वयं को बचाया जा सकता है। मान लीजिए,किसी ने कुसंग में आकर शराब पीना शुरू कर दिया और उसका आदि बन गया। उसे शराब छोड़ना बहुत मुश्किल लगता है। इसे छोड़ने के लिए बाहर से किसी प्रकार का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन अगर उसने पहले ही कुसंग से अपने को बचाया होता तो आज उसे शराब क्या, किसी भी बुराई का गुलाम नहीं बनना पड़ता। हमें संसार को भी ऐसी दिशा देनी है, जो संसार स्वर्णिम शिखर को ओर अग्रसर हो इसलिए हमें हर कदम पर अटेंशन बहुत-बहुत ज़रूरी है। 

मर्यादा की दीवार 

मर्यादा की रेखा नहीं, मर्यादा की दीवार जिससे दुश्मन झाँक भी न सके।जब दृष्टि जाती है तो संकल्प चलते हैं। दृष्टि इतनी ऊँची हो कि उसकी ऊंचाई को कोई व्यर्थ विचार भी छू न सके,  सुरक्षित रह सकते हैं। वैसे लक्ष्मण की एक लकीर भी सीता को सुरक्षित रख सकती थी परन्तु सीता ने मर्यादा की रेखा पार कर दी तो कहाँ  पहुँच गई! अतः जीवन को समस्याओं या शत्रुओं से बचाने के लिए मर्यादा की दीवार बना लेनी चाहिए। मर्यादाएं अमोघ सुरक्षा कवच हैं। पौराणिक सावित्री की कथा में उसके पतिव्रत की मर्यादा के आगे धर्मराज को भी झुकते दिखाया गया है। अहिंसा के पुजारी ने भी अपनी मर्यादा में रहकर ही भारत को आज़ाद कराया। मर्यादाएं  हमारे जीवन की आधार स्तम्भ हैं, जो समाज को भी सुकून और भविष्य को भी श्रेष्ठ्तम  आधार दे सुखमय और निश्चिन्त बनाती है। मर्यादाएं अनेकों को पथ विमुख होने से बचाती हैं। 

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