ज्वालास्वरूप योग अवस्था का आधार- पूर्णविराम | जैसे नाम वैसे यह अभ्यास भी कठिन है?अगर भगवान ही पाप भस्म करते है तो हमारा पुरुषार्थ क्या रहा?एकाग्रता या स्थिरता को कैसे अपनाएं?किन मुख्य बातों पर पूर्णविराम लगाएं?

ज्वालास्वरूप योग अवस्था का आधार- पूर्णविराम। 

ज्वालास्वरूप योग अवस्था का आधार- पूर्णविराम | जैसे नाम वैसे यह अभ्यास भी कठिन है?अगर भगवान ही पाप भस्म करते है तो हमारा पुरुषार्थ क्या रहा?एकाग्रता या स्थिरता को कैसे अपनाएं?किन मुख्य बातों पर पूर्णविराम लगाएं?

राजयोगाभ्यास की परमोच्च अवस्था है ज्वालास्वरूप स्थिति। वास्तव में यह ज्वाला नहीं बल्कि परम शांति और शीतलता की अवस्था है लेकिन जैसे ज्वालामुखी, पत्थर को भी पिघला देती है वैसे ही आत्मा के अति कठोर आसुरी संस्कारों को भी दग्ध करने की प्रचंड शक्ति इस अवस्था में होने के कारण इसे ज्वाला की उपमा दी गई है। स्वयं को आत्मा ज्योतिबिंदु समझकर, ज्ञान, गुण, शक्तियों के सागर ज्योतिबिंदु परमात्मा शिव पिता को ज्योतितिलक अर्थात परमधाम में मन-बुद्धि से याद करना,यह है बिंदुरूप स्थिति। इस स्थिति में एकाग्रता के साथ-साथ निरंतरता को जब कायम रखेंगे तब स्वीट साइलेंस या ज्वालास्वरूप अवस्था में प्रवेश करेंगे जिससे पाप भस्म होंगे।


जैसे नाम वैसे यह अभ्यास भी कठिन है?


जैसे नाम वैसे क्या ये अभ्यास भी कठिन है? बिल्कुल ही नहीं। कठिनाई तब है जब जिम्मेवारी स्वयं पर हो। अगर हमारी जिम्मेवारी कोई और उठाये तो फिर क्या कठिन है? समझो, एक बच्चा काफी देर तक बाहर खेलकर आया है, बदन पर मिट्टी जमी हुई है, कपड़े मैले हुए हैं, पैरों में कांटे चुभे हैं,ऐसे में उसका फिर से सुंदर बनना कठिन है क्या? नहीं! वह आकर अपनी माँ के सामने बैठता है। माँ उसको प्यार से गोद में बिठाती है, चुभे हुए कांटे निकलकर नहलाती है, तेल मालिश कर सुगन्धित द्रव्य है और थोड़े ही समय में विकृत रूप को परी जैसा बना देती है। वैसे ही योग में हमें केवल इतना करना है कि प्रेम के सागर, बिंदुरूप शिवपिता के सामने बिंदुरूप बन बैठना है। शिव पिता, हमारे संस्कारों में लिपटी हुई अशुद्धि अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के वशीभूत होकर किये हुए विकर्मों के अभिलेख को अपनी शक्ति से भस्म कर देते हैं जैसे कि अग्नि, सोने में मिश्रित अशुद्धता को जला देती है। जैसे चुंबक के सानिध्य में रखा लोहा भी चुंबक का गुण धारण कर लेता है वैसे ही ज्ञान,गुण, शक्तियों के सागर शिवबाबा अपनी दिव्यता हम आत्माओं में भर देते हैं। यहां कठिनाई की बात ही कहाँ है!


अगर भगवान ही पाप भस्म करते है तो हमारा पुरुषार्थ क्या रहा?


हमारा पुरुषार्थ है मन और बुद्धि को स्थिर रखना। अगर बच्चा माँ के सामने स्थिर होकर न बैठे, चंचलता के वश यहां-वहां भागे तो माँ मनपसंद सफाई और श्रृंगार नहीं कर सकती। वैसे ही योगाभ्यास के समय मन-बुद्धि अगर चंचल है, बिंदुरूप अवस्था पर दीर्घ समय तक स्थित नहीं हो पाते हैं तो संस्कार परिवर्तन की प्रक्रिया भी यथार्थ नहीं रहेगी, जैसे अधूरी सफाई, अधूरा श्रृंगार।


एकाग्रता या स्थिरता को कैसे अपनाएं?


इसका साधन है पूर्णविराम। जैसे वाहन में सबसे मुख्य पुर्जा होता है उसका ब्रेक। वाहन चलाते हुए ब्रेक ठीक नहीं लगे तो परिणाम है दुर्घटना! साधना के मार्ग पर भी संकल्पों को ब्रेक या पूर्णविराम लगाने का अभ्यास कमज़ोर है तो संस्कार परिवर्तन के पुरुषार्थ में असफल होना निश्चित है। योगाभ्यास में सबसे अधिक विघ्न व्यर्थ संकल्पों का पड़ता है जो बुद्धि को एकाग्र होने नहीं देते हैं। व्यर्थ संकल्पों की उत्पत्ति के कारण हैं अयथार्थ मनोवृत्ति, बोल और कर्म। इन तीनों बातों से मुक्त होने के लिए दिनचर्या में पूर्णविराम का प्रयोग करना अति आवश्यक है।


किन मुख्य बातों पर पूर्णविराम लगाएं?


दुःख देना और लेना:- मन-वचन-कर्म से किसी को दुःख देना, इससे हीन कर्म दूसरा नहीं है। जैसे ही संकल्प से, बोल से या कर्म से हम दुःख देते हैं तो तुरंत ही हम दो बातों से श्रापित हो जाते हैं। एक, हमारे प्रति उस आत्मा के बद्दुआ के संकल्पों से, दूसरा, दुःख देने का जो पाप कर्म हुआ उसका फल भी श्राप में परिवर्तित हो जाता है। दुःख लेना अर्थात स्वयं ही स्वयं को श्रापित करना। मन-मुटाव, वैर-विरोध, ईर्ष्या-द्वेष, लगाव-झुकाव-टकराव, जिद्द और सिद्ध करने की आदत, इन सारी परिणाम  दुःख देना और लेना। इन के प्रभाव से मन-बुद्धि एकाग्र  होने के बजाय भ्रष्ट बनते जाते हैं जिससे फिर योगभ्यास की गहराई में जाना असम्भव है। इसलिए ऐसे संकल्प, बोल और कर्म को उतपन्न होने से पहले ही रोक देना है।

परचिन्तन: जैसे सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आ गया तो ग्रहण लग जाता है, वैसे ही परमात्मा के रूप, गुण और कर्तव्य को देखने के बजाय अन्य आत्माओं की कमी-कमज़ोरी देखने से मन-बुद्धि को ग्रहण लग जाता है। ग्रहण को विघ्नसूचक और अशुभ माना जाता है। जैसे, परीक्षा में बैठेा परीक्षार्थी, अपनी पत्रिका छोड़ औरों की पत्रिका पर नज़र घुमाये तो परीक्षा से बहिष्कृत हो जाता है, वैसे ही परचिंतन भी साधक को साधना के मार्ग से हटाकर काँटों के ऐसे जंगल में ले जाता है जिससे मंज़िल की स्मृति प्रायलोप हो जाती है। परचिंतन शुरू होने से पहले ही उसको बिंदी लगा देने से ग्रहण से बच जाएंगे।  

बीती हुई बातें: बीती बातों को याद करना अर्थात मृत शरीर को ज़मीन से उखाड़ लेना या भूत का आह्वान करना। जैसे भूत से पीड़ित व्यक्ति परेशान और दुखी रहता है, वैसे ही भूतकाल की बातों की स्मृति में फँसा हुआ व्यक्ति भी अवास्तविक दुनिया में खोया रहता है। क्या,क्यों, कैसे, ऐसे भी होता है क्या? वैसे होना चाहिए था- ये प्रश्नों रुपी भूत मन-बुद्धि को वश में लेकर उसका एकाग्र होना असम्भव कर देते हैं। पुरानी  बातों को तो बिंदी लगानी ही है लेकिन हर पल जो बीत रहा है, उसको भी तुरंत पूर्णविराम लगाकर आगे बढ़ना, यह है शक्तिशाली पुरुषार्थ। पिछले क्षण की अशुभ और अयथार्थ बातें अगले क्षण याद न आएं। 

संगदोष: चूहे, बंदर आदि पकड़ने के लिए पिंजरे रखे जाते हैं जिनमें प्रलोभन के लिए खाद्य रखा जाता है। अंदर आया और फंसा। संगदोष भी एक पिंजरा है जहाँ अल्पकाल के भ्रामक आनंद का प्रलोभन रहता है। यदि दूरंदेशी बनकर बिंदी नहीं लगाएंगे तो लक्ष्य को भूल मिथ्या मार्ग पर भटकना निश्चित है, जहाँ स्वयं के साथ-साथ दूसरों का भी पतन है। 

मनोरंजन के साधन: आजकल मनोरंजन के साधन जैसे की टी.वी, मोबाइल, इंटरनेट आदि के नकारात्मक प्रभाव बहुमुखी हैं। ये अमूल्य समय को नष्ट कर देते हैं, बार-बार देखने का, सुनने का आकर्षण बना देते हैं और रंग-बिरंगे आकर्षणों में मन-बुद्धि को आसक्त कर देते हैं। देखी हुई, सुनी हुई बातें बार-बार याद आने के कारण मन की एकाग्रता या स्थिरता नहीं रहेगी। 

इच्छा भरी जीभ: मन-बुद्धि को चंचल बनाकर साधक को साधना के बदले पदार्थों में लपेट देता है स्वाद का आकर्षण। पदार्थ मिला तो आसक्ति में फंसे, नहीं मिला तो दुःख में डूबे। आसक्ति और दुःख- ये दोनों एकाग्रता के शत्रु हैं। शरीर को चलाने के लिए जो भी मिला उसको अनासक्त भाव से परमात्मा की याद में स्वीकार करना ही बिंदी लगाने की युक्ति है। 

जैसे-जैसे पूर्णविराम लगाने में प्रवीणता पाते जाएंगे, संकल्पों का घेराव काम होता जाएगा। इससे योगाभ्यास में एकाग्र मन-बुद्धि से सर्वशक्तिवान शिवपिता को निरंतर निहारना या ज्वालास्वरूप अवस्था में दीर्घ समय तक स्थित होना सहज हो जाएगा। हमें यह स्पष्ट अनुभव होगा कि शिवपिता हमारे ज़हरीले अर्थात विकारी संस्कारों को भस्म कर रहे हैं और दिव्य गुणों से हमारा श्रृंगार कर रहे हैं। 

ॐ शांति। 

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