गुणों का धन | अपने अंदर गुण कैसे धारण करें ? Wealth of qualities | How to develop yourselves | How to gain qualities | Personality development in hindi

गुणों का धन 


एक राजा जंगल में शिकार खेलते रास्ता भटक गया। प्यास के मारे गला सूखने लगा। पानी की तलाश में इधर-उधर देखते उसकी नज़र एक सन्यासी पर पड़ी। उसके हाथ में पानी की सुराही देख राजा को आश बंधी और अपने रजाई गर्व से ऊँचे स्वर में बोला, हे सन्यासी, मुझे पानी पिलाओ, मैं प्यास से मरा जा रहा हूँ। सन्यासी ने पूछा आप कौन हो,यहां क्या कर रहे हो? राजा ने उसी दर्प से उत्तर दिया, मैं इस राज्य का राजा हूँ। सन्यासी ने कहा, इस समय तुम राजा नहीं, एक याचक हो, फिर भी मैं पानी दूंगा परन्तु बदले में तुम क्या दोगे ? राजा ने पहले अपनी स्वर्ण अंगूठी और फिर सारे आभूषणों को देने का प्रस्ताव रखा पर सन्यासी नहीं माना। तब राजा ने अपने राज्य में पहुंचकर बहुत सारी ज़मीन व धन देने की बात कही पर सन्यासी टस से मस नहीं हुआ। राजा ने धन की मात्रा बढ़ाते-बढ़ाते अंततः विवश होकर कहा कि मेरा सारा राज्य तुम्हारा पर मुझे पानी पीला दो, नहीं तो मेरा जीना  मुश्किल है। सन्यासी हंस पड़ा और बोला,राजन,संपत्ति पाना मेरा लक्ष्य होता तो सन्यासी क्यों बनता पर चलो, पानी पियो। पानी पिलाकर वह पुनः बोला, राजन, मैं तो आपको ये आभास दिलाना चाहता था कि अभिमान ऊँचा जाता है तो संपत्ति की कीमत कम हो जाती है। तुम्हारे अभिमान ने तुम्हारे राजपाट की कीमत इतनी घटा दी कि वह पानी की कुछ बूंदों से भी कम कीमत का हो गया। राजन, सम्पत्ति की कीमत हमारे गुणों से बढ़ती है और अवगुणों से काम हो जाती है। अवगुणों के कारण ही हमारी संपत्ति हमसे छीन भी जाती है।
यादगार ग्रन्थ रामायण में कहा गया है, जहां सुमति वहां संपत्ति विनाना। भावार्थ है कि जहाँ सद्बुद्धि है वहाँ अनेक प्रकार की सम्पत्तियाँ हमारी सेवक बन जाती है। उपरोक्त कहानी को हम थोड़े परिवर्तन के साथ पुनः पढ़ते हैं-
जंगल में प्यास से परेशान राजा ने जब पानी की सुराही लिए हुए सन्यासी को देखा तो नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा, हे सन्यासी महाराज, आप तो दया के अवतार हैं, जल रुपी अमृत की कुछ बूंदों से प्राणदान दीजिये। सन्यासी ने बड़े प्यार से राजा को भरपेट पानी पिलाया और कहा, राजन, आपकी नम्रता ने मेरी दुआ रूपी जल को भी अपनी ओर खिंच लिया है। मैं आपके पहनावे से जान गया हूँ,आप राजा हैं और आप जैसे शालीन और निराभिमानी राजा का धन-बल द्विगुणित हो, यही मेरा आशीर्वाद है। ऐसा कहकर सन्यासी ने उन्हें उनके शिविर तक पहुंचा दिया।
पिछली कहानी में राजा एक गिलास पानी के बदले राज-पाट दॉँव पर लगाता है अर्थात पानी इतना महंगा।दूसरी कहानी में राजा बिना कीमत भरपेट पानी पीता है अर्थात पानी इतना सस्ता! इससे सिद्ध होता है कि जब मानव गुणवान था,देवतुल्य था तो प्रकृति के सर्व अमूल्य उपहार उसके सेवक थे परन्तु कालक्रम में जैसे-जैसे उसकी कलाएं उतरती गईं , गुणों का स्थान दुर्गुणों ने ले लिया, उसमें अहंकार का प्रवेश हुआ तो जीवनोपयोगी चीज़ें महंगी हो गयीं। हवा,पानी सब कुछ बिकने लगा।
यदि हम चाहते हैं कि जीवनयापन के सभी साधन, सभी को सरलता से उपलब्ध हों, कहीं भी भूख, गरीबी ना हो तो इसके लिए गुणों रुपी धन से जीवन को धनवान बनाएं। स्थूल धन की अधिकता मनुष्य को अहंकारी बना सकती है परन्तु ज्ञान, गुणों, शक्तियों जैसे कई अन्य धन उसे अधिकाधिक नम्र और मिलनसार बना देते हैं।  आइये देखें वे धन कौन-कौन से हैं-


समय रुपी धन-

यह वो धन है जो समाप्त हो जाये तो चाहने पर भी वापस लौट कर नहीं आता और जो शेष है वह बिना प्रयास के ही हम तक पहुँच वर्तमान के रूप में साथ चलता रहता है। इसलिए खर्च(बीते) हुए समय से प्राप्त अनुभवों की शक्ति से वर्तमान एवं आने वाले समय को श्रेष्ठ रूप से खर्च करने की कला ही श्रेष्ठ जीवन जीने की कला है। समय के सदुपयोग द्वारा प्राप्त सुखद अनुभव ही हमारी सच्ची संपत्ति है, जो अंतर्मन में संतुष्टिकारक स्मृतियों एवं ज्ञान के रूप में समाहित हो जाती हैं। जो अपने समय रुपी धन को श्रेष्ठ कार्यों व स्वउन्नती में खर्च(सफल) नहीं करते हैं उन्हें सुखद अनुभवों व पुण्य स्मृतियों के स्थान पर पश्चाताप एवं असंतुष्टता का बोझ ढोना पड़ता है। यह सिद्धांत है कि  समय उनका साथ देता है जो समय के साथ चलते हैं और उसे सफल करते हैं। 
जिन्होंने अपना पूर्व समय सफल नहीं किया होता है उन्हें आगे के जीवन में अतिरिक्त कार्य भार उठाकर उस व्यर्थ गवाए समय की भरपाई करनी पड़ती है। सही समय पर यदि किसान बीज न बोये तो फसल अच्छी नहीं होती।  अतः स्थूल धन प्राप्ति में भी बहुत अधिक महत्त्व इस बात का है कि सही समय पर, सही निर्णय व कार्य किया जाये। नहीं तो बाद में उस कार्य का महत्व नहीं रहता। 


सद्गुणों रुपी धन-

साहस, आत्मविश्वास, मर्यादा, शालीनता, विनम्रता, कर्मठता, सरलता, मिठास, परोपकार इत्यादि एक-एक गुण रुपी धन मनुष्य को सफलता के शिखर पर बैठाता है। साहस के बिना क्या कोई महान योद्धा बन सकता है? आत्मविश्वास के बिना क्या कोई कठिन कार्य व जीवन की चुनौती स्वीकार की जा सकती है? मर्यादा के बिना क्या विश्वासपात्र बना जा सकता है?कर्मठता के बिना सफलता और सरलता के बिना समन्वय हो सकता है क्या? शालीनता के बिना स्नेह और विनम्रता के बिना सम्मान मिल सकता है क्या?मिठास बिना प्रेम तथा परोपकार बिना जनश्रद्धा और आशीर्वाद मिल सकते हैं क्या? ईमानदारी, नियमितता, अनुशासन, सहनशीलता, सभ्यता, गम्भरीता आदि कितने ही गुण है जिनके बिना जीवन की उच्चता संभव ही है। तो सद्गुण बहुत बड़ी संपत्ति है जिनके रहित मानव जीवन कभी अभावग्रस्त नहीं हो सकता। मनुष्यात्मा  है तो सद्गुण उसकी चमक है। इनके बिना हीरे की कीमत कभी उच्च नहीं हो सकती। 


आध्यात्मिक शक्तियों रूपी धन-


गुण व शक्तियां एक दूसरे की पूरक हैं। गुणों के बिना शक्ति नहीं होती और शक्ति के अभाव में गुणों को श्रेष्ठता पूर्वक वयवहार में नहीं लाया जा सकता। इसलिए गुणप्रधान जीवन जीने  के लिए शक्तियों रुपी धन अनिवार्य है। शांति के गुण का सम्बन्ध एकाग्रता, स्वनियंत्रण एवं समाने की शक्ति से विशेष है। पवित्रता का सम्बन्ध सत्यता, विश्वास एवं दृढ़ता से है। प्रेम का सम्बन्ध सहयोग, लगन व सामना करने की शक्ति से है। इसी प्रकार परखने, निर्णय करने, विस्तार को संकीर्ण करने, समेटने तथा नेतृत्व करने की शक्ति- सफलता के लिए अनिवार्य है।  ईश्वरीय ज्ञान का सतत चिंतन एवं परमात्मा पिता की प्रेम व तन्मयतामयी याद इन शक्तियों को जागृत कर देती है। जीवन की जिन कठिन परीक्षाओं में धन-संपत्ति कुछ नहीं कर पाती वहां आध्यात्मिक शक्तियों से प्राप्त मनोबल एवं दृढ इच्छा शक्ति ही काम आती है। इन्ही शक्तियों के आधार पर कोई महामानव और कोई साधारण मानव बन जाता है।   


दुआओं रुपी धन-

दुआओं के प्रभाव चमत्कार की तरह अनुभव होते  हैं। अचानक कोई व्यक्ति व साधन ऐसे सहयोगी बन जाते हैं, जिनकी हमें आशा नहीं होती। अज्ञात प्रेरणाएं हमारा मनोबल बढ़ा देती हैं। दुआएं वो असरदार होती हैं जो सच्चे दिल से निकलती हैं। शर्तों, सुविधाओं और अनुकूलता के मापदंडो पर ली गयी और दी गयी दुआओं में विशेष असर नहीं होता। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति घरेलू समस्याओं, कलह आदि मिटने की भावना से  भिखारियों को भोजन-वस्त्र आदि देता है तो उसके मन में भिखारियों के प्रति दयाभाव बाद में है परन्तु अपनी समस्या दूर करने के लिए दुआएं व पुण्य पाने की अपेक्षा  पहले है। यह शुभ कर्म उसकी आवश्यकता उससे करा रही है, न की दया। ऐसी अपेक्षाओं के साथ किये गए अच्छे कार्य का फल भी साधारण व अल्प ही रहेगा। लेकिन चरित्र की गुणवत्ता के साथ किये गए कर्मों के बदले दिल के आशीर्वाद मिलते हैं। ऐसा व्यक्ति उसे भी दुआएं दे सकता है जो उसकी आलोचना करता हो परन्तु सही मार्ग दिखता हो।  आधारशिला पर मिला दुआओं का धन या तो साधारण सिक्का है या खोता सिक्का, सच्चा मोती नहीं। 


श्रेष्ठ कर्मों रुपी धन-

पुण्य का खज़ाना, भाग्य व समय रुपी बैंक में जमा उस फिक्स डिपाजिट की तरह है जिसकी किश्त समय पूरा होने पर स्वतः ब्याज सहित मिलती है। यह वर्तमान में कमाया हुआ धन नहीं बल्कि पूर्व संचित धन होता है, जो समय  पर फलीभूत  होता है। अच्छे कुल  जन्म लेना, अच्छा मार्गदर्शक मिलना-ये सब पुण्य फलीभूत होने के परिणाम है। ऐसे सौभाग्य को अच्छे कर्मों से बढ़ाना और सुरक्षित रखना आवश्यक  है नहीं तो मात्र भोग-उपभोग में खर्च करते रहने से यह धन समाप्त होता जाता है और कुसंग में तो तेज़ी से विनष्ट हो जाता है। 

इसलिए आइये त्रिलोकीनाथ परमपिता शिव परमात्मा से सर्व सम्बन्ध जोड़कर सभी प्रकार के धनों से मालामाल बने।  

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