शक्ति का आधार- अनासक्ति | अपनी रूहानी शक्ति बढ़ाओ | चीज़ों में सुख नहीं है | चीज़ों को बड़ाई बटोरने का आधार न बनाएँ | कर्मों की उलझी हुई कड़ी | पाप-पुण्य का फल | एक-दो का नहीं, सर्व का कल्याणकारी | तड़फ बोएंगे तो वही काटनी पड़ेगी

शक्ति का आधार- अनासक्ति 

शक्ति का आधार- अनासक्ति | अपनी रूहानी शक्ति बढ़ाओ | चीज़ों में सुख नहीं है | चीज़ों को बड़ाई बटोरने का आधार न बनाएँ | कर्मों की उलझी हुई कड़ी | पाप-पुण्य का फल | एक-दो का नहीं, सर्व का कल्याणकारी | तड़फ बोएंगे तो वही काटनी पड़ेगी


हर इंसान शक्तिशाली बनना चाहता है। शारीरिक शक्ति तो पशु के पास भी होती है लेकिन इंसान की महानता उसकी आत्मिक और आतंरिक शक्ति में है। जिस व्यक्ति में विकसित आत्म-बल है वो हर जगह हर क्षेत्र में चमत्कारिक काम कर दिखाता है। औरों को असम्भव लगने वाला कार्य उसे चुटकियों का खेल लगता है। आतंरिक शक्ति के बढ़ने का आधार है- अनासक्ति। अनासक्त होने का मतलब है- वैरागी, राग-रहित, आकर्षण मुक्त, न्यारा, मन से अछूता, संयमी, इन्द्रियजीत आदि-आदि। ऐसा व्यक्ति संसार में रहते, सर्व कर्तव्य पूर्ण  करते भी अपने आंतरिक बल का क्षरण नहीं होने देता। वह साक्षीद्रष्टा बन संसार की हर घटना को नाटक के भिन्न-भिन्न दृश्यों की तरह देखता है और उनका आनंद लेता है। दूसरों को जो बात आनंद में बाधा डालने वाली लगती है, वह उसमें भी आनंद खोज लेता है। जैसे एक कुशल गृहिणी गर्म पतीले को पकड़ने के लिए बीच में कपड़ा रख लेती है और पतीले की गर्माहट से आहत नहीं होती, उसी प्रकार, साक्षीद्रष्टा व्यक्ति भी अपने और संसार के बीच में ईश्वर और ईश्वरीय ज्ञान को रखकर मर्माहत नहीं होता। 


चीज़ बिगड़ी पर मन को न बिगाड़ें 

कई बार कोई प्रिय  वस्तु जब टूट जाती है, खराब हो जाती है या खो जाती है तो दुःख बहुत होता है। ऐसा करने के निमित्त व्यक्ति पर गुस्सा भी बहुत आता है परन्तु हम विचार करें, हम सब आत्माओं की प्रिय से प्रिय वस्तु है अपना-अपना शरीर। यह निरंतर हमारी निगरानी में है, हमारे साथ-साथ है, फिर भी यह नित्य परिवर्तन हो रहा है, दिन-प्रतिदिन बदरंग हो  रहा है। इसके बाल काले से सफ़ेद हो गए, किस पर गुस्सा करेंगे? दांत हिलने लगे, घुटने जुड़ने लगे, कान कम सुनने लगे, कमर झुकने लगी और त्वचा ढीली पड़ने लगी, इन सबके बिगाड़ के लिए किस पर गुस्सा करेंगे? क्या प्रकृति पर? क्या समय पर? जो चीज़ बनी है वह बिगड़ेगी भी। बनने के  साथ ही उसका बिगड़ना या टूटना या खोना या खराब होना निश्चित हो जाता है। चीज़ों का बदलना हम नहीं रोक सकते पर उनके कारण अपने मन को तो न बिगाड़ें। चीज़ों को नहीं पकड़ सकते परन्तु अपने मन को तो पकड़ें। चीज़ें वश में न  थी,न हो सकती हैं पर मन तो हमारी अपनी शक्ति है, उसे तो अपने वश में रखें। अतः ध्यान रहे, नश्वर वस्तुओं के पीछे अनश्वर मन को कुर्बान न करें, उसकी शक्तियों को नष्ट न करें, उसे स्थिर और शांत रखें। 


चीज़ों में सुख नहीं है

किसी भी वस्तु में सुख नहीं है। दुनिया की जो भी चीज़ें निर्मित होती है, वे आवश्यकता पूर्ति कर सकती है परन्तु सुख अथवा आनंद नहीं दे सकती, क्योंकि वे जड़ है। जड़ चीज़ में सुख-शांति-आनंद होता ही नहीं है। ये गुण तो चेतन आत्मा के हैं। हाँ, चीज़ को बनाते, बेचते, खरीदते यदि आत्मा के सुख-शांति-आनंद के प्रकम्पन उसके चारों ओर फैलें तो वे प्रकम्पन उस वस्तु को सुखदाई बना सकते हैं। परन्तु हम जानतें हैं कि  किसी भी उत्पादन के चारों ओर लाभ-लाभ-लाभ के ही प्रकम्पन होते हैं। मान लीजिये,  उद्योगपति एक फूलदान बनाने की फैक्ट्री लगाता है तो सबसे पहले क्या सोचता है, मुझे लाभ कितना होगा? उस फैक्ट्री में काम करने वाले कामगारों की बुद्धि में भी यही घूमता है कि काम के बदले कितना धन मिलेगा? फैक्ट्री से माल खरीदने वाले थोक विक्रेता या खुदरा विक्रेता भी यही अंदाज़ लगाते हैं कि कितने पीस बिके और एक पीस में कितनी बचत हुई! इस प्रकार धन-धन, लाभ-लाभ के प्रकम्पनों से भरी उस चीज़ को जब हम खरीद कर ले आते हैं तो देखने वाले यही पूछते हैं कि कितने में खरीदी?


चीज़ों को बड़ाई बटोरने का आधार न बनाएँ 

यदि वस्तु महंगी है तो घर में कलह का कारण, झगड़े का कारण, ईर्ष्या का कारण बन सकती है। कोई यह भी कह देगा, तुम तो इस वस्तु के लायक ही नहीं हो, यह तो मेरे पास होनी चाहिए। कोई सोचेगा, यह इतने पैसे कहाँ से ले आये? कोई ईर्ष्या का मारा उससे भी बढ़िया ढूंढने बाज़ार के चक्कर लगाएगा, आपको मात देने की कोशिश करेगा। कहने का भाव यह है कि वस्तु के उत्पादन से लेकर प्रयोग करने तक उसने कहीं भी सुख शांति नहीं बिखेरी। इसलिए चीज़ों से ज़रूरत पूरी करें और न्यारे हो जाएँ। चीज़ों को बड़े बटोरने का आधार न बनाएँ। बड़ाई बटोरने के लिए आत्मा के मूल गुणों को प्रदर्शन करें जो  कहीं से खरीदने नहीं पड़ते, आत्मा की मूल धरोहर के रूप में सभी के पास हैं ही है। 


कर्मों की उलझी हुई कड़ी 

हम जिन संबंधों के बीच में रहते हैं उनमें से कई अत्यंत दुखदाई हो सकते हैं। तब मन में सवाल उठता है, ऐसा क्यों है? दो परिवारों में कुछ दिनों के अंतराल में जन्मे दो बच्चे के व्यव्हार में ज़मीन-आसमान का अंतर क्यों हो जाता है? हमारा बच्चा, हमारे चित्त में निरंतर चिंता के बीज क्यों बोता रहता है? इसके पीछे अवश्य ही कर्मों की उलझी हुई कड़ी है। मान लीजिये, किसी पूर्व जन्म में, बच्चे की आत्मा किसी घर में बुज़ुर्ग का रोल प्ले कर रही थी और मैं उसी घर की बहु थी। इस बुज़ुर्ग की और मेरे संस्कारों की रास कभी नहीं मिलती थी। मैं जवान थी, समर्थ थी और वह बुज़ुर्ग था और असमर्थ था। मेरे व्यवहार की पीड़ा से पीड़ित होकर, मज़बूरी-वश वह कुछ नकारात्मक प्रतिक्रिया कर नहीं पाता था पर मन ही मन भगवान को या अपने आप को कहता था कि अब नहीं तो फिर किसी जन्म में मुझे इस पीड़ा का बदला लेना है। वह इसी चिंतन में अब शरीर छोड़ता है। मेरे द्वारा पीड़ा की अनुभूति की स्मृति उसे अब इस जन्म में मेरा पुत्र बनाकर ले आयी है।  


पाप-पुण्य का फल 

मैं इस बात से अनभिज्ञ हूँ। जानता वह भी नहीं है परन्तु उसके अंदर संस्कारों में बदले की भावना भरी हुई है। हम उसे प्यार, दुलार सब देते हैं परन्तु उसका हर कर्म दुखदाई है। हम अच्छा पहनाते हैं, अच्छा खिलाते हैं फिर भी वह पसीजता नहीं है, क्यों? क्योंकि वह इस भाव को लेकर जन्मा है कि मुझे पूर्व की उस पीड़ा का बदला लेना है। बदला लेने के लिए नज़दीक संबंध में आना ज़रूरी है। सबसे समीप का संबंध पुत्र, पुत्री, पति या पत्नी का होता है। पुत्री से भी अधिक पुत्र का। हम उसे अपना सब कुछ दे देते हैं, वह हमारा कमाया खाता भी है और हमें रुलाता भी है। यह कमर्बन्धन है। कर्मों की पाप-पूंजी का फल है। अब समाधान यही है कि हम पुत्र-मोह, पुत्र-सुख  की कामना छोड़ भगवान में मन लगाएँ ताकि वो पीड़ा के बोए बीज काट जाएं। जैसे-जैसे योगबल से हिसाब-किताब चुक्ता होता जाएगा, पुत्र के माध्यम से सताने वाला कर्मबन्धन हल्का होता जाएगा और एक दिन समाप्त भी हो जाएगा। इसलिए सर्व प्रकार के कर्मबन्धनों को समाप्त करने की दवा है प्यारे पिता परमात्मा की प्यार भरी याद।   


एक-दो का नहीं, सर्व का कल्याणकारी 

कई  आत्माएं परमपिता परमात्मा से फरियाद करती हैं कि हमारे पति की या पुत्र की या पत्नी की बुद्धि ठीक कर दो। प्यारे बाबा ऐसे बच्चों के लिए कहते हैं, आपकी भावना बड़ी शुभ है, कल्याण की है परन्तु यह भावना हद की है और मैं बेहद का पिता हूँ। मैं बेहद की शुभकामनाएं पूरी करने आया हूँ और उन्हें पूरा कर रहा हूँ। जैसे कोई चीनी का थोक व्यापारी है और प्रतिदिन चीनी की बोरियों से भरे ट्रक भारत के कोने-कोने में भेजता है। कोई उस व्यापारी से कहे, सेठ जी एक किलो चीनी दे दो, तो सेठ क्या कहेंगे, मैं चीनी की भरी हुई बंद बोरियां बेचता हूँ,मैं एक-एक किलो बेच नहीं सकता। इसी प्रकार शिवबाबा भी कहते हैं, मैं एक-दो नहीं, सर्व का कल्याणकारी हूँ। हाँ,यदि हम कहेंगे, बाबा, विश्व की सभी आत्माओं के पुत्रों, पत्नियों, पतियों की बुद्धि को ठीक कर दो तो इस बेहद की बात को वो सुनेंगे भी और करेंगे भी। इस प्रकार सर्व के कल्याण में हमारा भी कल्याण हो जाएगा। 


अपनी रूहानी शक्ति बढ़ाओ  

कई बार हम बाबा के आगे  फ़रियाद  करते हैं कि बाबा मेरी शक्ति कम है, मेरा प्रभाव मेरे परिवार वालों पर नहीं पड़ता, आप कुछ कर दो ताकि वो बदलें। यह संकल्प है तो शुद्ध परन्तु यह भी ऐसे है जैसे कोई कहे, मेरे हाथ स्वच्छ नहीं हैं, कोई मेरे घर को, कपड़ों को, बच्चो को साफ़ कर दे। विचाए कीजिए, क्या कोई अन्य यह कार्य निभा पाएगा? हमें कहा जाएगा, आप ही अपने हाथ साफ़ कर लो, और फिर पूरा अपना कार्य कर लो।  बाबा भी कहते हैं, बच्चे, आप अपनी रूहानी शक्ति बढ़ाओ। मैं आपको याद की विधि से शक्ति देने को तैयार हूँ। जो मुझे पहचानते नहीं, जिनका मुझसे कनेक्शन नहीं, उन तक मेरा करेंट जाएगा कैसे? हम जानते हैं, हमें अपने बंधन अपने ही श्रेष्ठ कर्मों से काटने हैं। यदि हम भगवान से केवल फ़रियाद करते हैं तो केवल फरियाद का फल कैसे निकल पाएगा? 


तड़फ बोएंगे तो वही काटनी पड़ेगी

यादगार ग्रन्थ रामायण में दिखाया है कि जब राजा दशरथ से श्रीराम के लिए वनवास का वर माँगा गया तो वे बहुत तड़फे, रोए, गिड़गिड़ाए। उनका पुत्र श्रीराम(जिसे भगवान माना गया) अपने पिता को उस तड़फ और दुःख से बचा नहीं पाए क्योंकि यह दुःख राजा दशरथ के अपने कर्म का फल था। उसके शब्दभेदी तीर से श्रवणकुमार की मृत्यु होने पर, श्रवणकुमार के माता-पिता ऐसे ही तड़फे थे। तड़फ बोएंगे तो वही काटनी पड़ेगी। ख़ुशी बोएंगे तो वही काटने को मिलेगी। जो मिल रहा है, अवश्य ही वो हमारा ही बोया हुआ था। 

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