मन ही शत्रु, मन ही मित्र | बदलना है बीज को | मानव जीवन का बीज है विचार | मन का मन द्वारा सुधार | जीवन की परीक्षा में हम क्या कर रहे थे?गुण और शक्तियों रुपी धन | केवल भौतिकता के सहारे चैन नहीं मिल पाता

 मन ही शत्रु, मन ही मित्र 

मन ही शत्रु, मन ही मित्र | बदलना है बीज को | मानव जीवन का बीज है विचार | मन का मन द्वारा सुधार | जीवन की परीक्षा में हम क्या कर रहे थे?गुण और शक्तियों रुपी धन | केवल भौतिकता के सहारे चैन नहीं मिल पाता


नीतिकारों ने कहा है, ' मन एव बंधन,मोक्ष कारणम' मानव के बंधन या मुक्ति का कारण उसका अपना मन है। जैसे पानी में मिटटी मिल जाने से कीचड़ हो जाता है फिर उस कीचड़ की सफाई भी पानी से होती है। कीचड़ होने का कारण भी पानी है और धुलने का कारण भी पानी है, उसी प्रकार मानव के गिरने का कारण भी मन है और उठने का कारण भी मन है। मन जब विषय-विकारों का चिंतन करता है तो जीवन नीचे गिरता जाता है परन्तु जब ईश्वर-चिंतन करने लगता है तो जीवन ऊपर उठता जाता है। 
आध्यात्मिकता मन को धोने और मांजने का तरीका सिखाती है। जो भीतर से मंज जाएगा, बाहर उसका सब ठीक हो जाएगा। जो भीतर  से व्यवस्थित है उसकी ज़िंदगी बाहर से स्वतः व्यवस्थित हो जाती है और जो भीतर से विचारों में अस्त-व्यस्त है उसकी हर प्रक्रिया बाहर से भी अस्त-व्यस्त हो जाती है। 

बदलना है बीज को 

अगर हम करेले को मीठा बनाना चाहें तो क्या करेंगे? उसके पत्ते, तना, फूल बदलेंगे या बीज बदलेंगे? अवश्य ही बीज बदलेंगे। बीज में मिठास वाले तत्व डाल देंगे। अगली बार इस बीज से जो करेला उगेगा वह कड़वा नहीं होगा। अतः लम्बी-चौड़ी बेल के बदले मात्र छोटा-सा बीज बदलने से काम हो जाएगा। 

मानव जीवन का बीज है विचार 

मानव जीवन का बीज क्या है? विचार ही मानव-जीवन का बीज है। जैसे ईंट-ईंट से भवन बनता है, उसी प्रकार एक-एक विचार से जीवन बनता है। अगर ईंट कमज़ोर है, कच्ची है तो भवन कैसा बनेगा? एक झटके के साथ गिर जाएगा।  इसी प्रकार जिसके मन के विचार नकारात्मक और गंदे हैं, समझ लीजिये, उसके जीवन रुपी भवन की ईंटें भी बड़ी कमज़ोर हैं। छोटी-सी परिस्थिति आई, थोड़ा-सा विरोध हुआ तो उसका भी जीवन डगमगा जाएगा। 
प्रश्न यह है कि विचारों को शक्तिशाली बनाने के लिए क्या करना पड़ेगा? इसके लिए अपने मन के विचारों के सशक्तिकरण की विधि सीखनी होगी। हर छोटी-बड़ी बात सीखने से ही जीवन में आ पाती है। अतः मन को श्रेष्ठ, शांत, महान बनाने के लिए प्रशिक्षण चाहिए जो आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग के द्वारा ब्रह्माकुमारीज़ की हर शाखा में दिया जाता है। 

मन का मन द्वारा सुधार 

मन को मन के द्वारा ही सुधारना है। हम अनाज बीनते हैं तो कैसे एक-एक दाने को ध्यान से देखते हैं, उनमें मिले कंकरों को पहचानते हैं और फिर उन्हें बाहर निकाल फेंकते हैं। जब कपड़े धोते हैं तो पूरे कपड़े को फैलाकर उसका एक-एक दाग ढूंढते हैं और फिर किसी केमिकल के सहयोग से रगड़-रगड़ कर उसे मिटा डालते हैं। सफाई की यही प्रक्रिया है। पहले ध्यान से देखो, पहचानो, फिर उन्मूलन करो। मन को मित्र बनाने के लिए भी इसके संकल्पों को देखो, उनको परखो, पहचानो और यदि व्यर्थ या विकारी या नकारात्मक हैं तो वहीँ समाप्त कर दो।  
यह प्रक्रिया भीतर जाकर करनी है। कइयों को भीतर जाना बंधन लगता है परन्तु वास्तव में मुक्ति की शुरुआत अंदर से ही होती है।  मन को परखना और बदलना यह गुप्त प्रक्रिया है। जैसे बीज धरती के अंदर क्रिया करके फिर बाहरी जगत को अपने परिवर्तन का परिणाम दिखता है। जगत उसकी बदलने की क्रिया को नहीं देखता पर उसके बदलाव को अवश्य देख पाता है।  
हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि कल अंग्रेजी का पेपर है अतः आज इतिहास मत पढ़ो, अंग्रेजी की अच्छे से तैयारी करो। यदि  बच्चा अंग्रेजी के बजाय हिंदी या भूगोल की पुस्तक लेकर बैठ जाये तो हम झुंझलाते हैं कि फीस के पैसे व्यर्थ चले जाएंगे इसलिए जिस समय जो विषय ज़रूरी है, उस समय वही पढ़ो। 

जीवन की परीक्षा में हम क्या कर रहे थे?

बच्चों को किस समय क्या करना चाहिए, यह सही निर्णय हम तुरंत ले लेते हैं परन्तु अपने बारे में? मान लीजिये, हमारे शरीर के किसी अंग में दर्द है और हम दूसरे-दूसरे कार्यों को महत्व देते हुए दर्द की उपेक्षा किये जा रहे हैं। कभी सोचते हैं, जब बिल्कुल खाली होंगे तब इलाज करेंगे, अमुक व्यक्ति की छुट्टी होगी तब करेंगे, सीजन के बाद करेंगे और ऐसे समय को खिसकाते-खिसकाते दो या तीन महीने निकाल देते हैं। इसके बाद डॉक्टर के पास गए तो उसने कहा, दो महीने पहले आ जाते तो मात्र दवा से काम चल जाता, अब तो ऑपरेशन करना पड़ेगा और  एक  लाख से ऊपर खर्च हो जाएगा। हम बच्चे को फीस की  दुहाई दे कर समय के अनुकूल विषय पढ़ने की प्रेरणा दे रहे थे परन्तु जीवन की परीक्षा में हम क्या कर रहे हैं? बीमारी वाले विषय को छोड़कर और-और विषय पढ़ते रहे,दर्द भी सहा और इलाज भी महंगा कर बैठे। 

गुण और शक्तियों रुपी धन 

जीवन की पाठशाला में हम सभी विद्यार्थी हैं। केवल बच्चों को नहीं, हम सभी को भी प्रतिपल सीखना है। बच्चों का पाठ्यक्रम तो सीमित होता है, छह, आठ, दस या कुछ और ज़्यादा किताबें, लेकिन ज़िंदगी की  न पाठ्यक्रम निश्चित है, न समय। ऐसे में कभी भी,कहीं से भी आ जाने वाली परिस्थिति  को पार करने के लिए मन का बल चाहिए, आत्मबल चाहिए, वह हमने कितना इकठ्ठा किया है? धन तो एकत्रित कर लिया पर धन हर जगह समाधान नहीं पाता। एक परीक्षा सामने आई संबंध के रूप में। अचानक पता चला कि बच्चे को कुसंग लग गया। क्या धन से बच्चे का कुसंग छुड़ा सकेंगे? बैंक में तो हमारे पांच करोड़ हैं। बच्चा गलत समय पर आता है, गलत चीज़ें खाता-पीता है, सामने बोलता है, अपशब्द बोलता है......इन्हें ठीक करने में धन की क्या भूमिका है? यहां तो आत्मा में गुण और शक्तियों रुपी धन की ज़रूरत है। हम बच्चे के व्यवहार  को सहन कर सकें, फिर उसकी कमज़ोरियों का सामना कर सकें, उसकी नादानी पर रहम कर सकें, अपने शुद्ध स्नेह से उसे बदल सकें, धैर्य से उपयुक्त वातावरण का निर्माण कर सकें आदि-आदि। क्या यह धन हमने कमाया, इतना मनोबल एकत्रित किया?

केवल भौतिकता के सहारे चैन नहीं मिल पाता 

यदि मनोबल नहीं है तो बच्चे को देख-देख रोएंगे, दुखी होंगे, खाना भी नहीं खाया जाएगा, दिनभर चिंता लगी रहेगी, रात को नींद भी नहीं आएगी, मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा परन्तु सवाल यह है कि ऐसे में हमारा अतिप्रिय धन (5 करोड़), जो हमने ऊर्जा झोंककर कमाया, क्या कर रहा है? हमने कमाया था कि आड़े वक्त में काम आएगा और यह आडा वक्त आया तो वह क्या कर रहा है, मेरी मदद क्यों नहीं कर रहा, मुझे चैन से सुला  क्यों नहीं रहा? इसलिए कि जीवन केवल भौतिक धन के सहारे सारे चैन नहीं पा सकता, इसके लिए आत्मबल,  सहनशीलता, धैर्य, नम्रता, शांति आदि आध्यात्मिक धन भी चाहिए। ये भी तो कमाने पड़ते हैं। इन्हें कमाने का आधार है आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग का अभ्यास। 

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