मम्मा की विशेषताएं-दादी जानकी द्वारा | कैसी थी मम्मा? मम्मा का न्यारे और प्यारेपन का बैलेंस!!

मम्मा की विशेषताएं -

राजयोगिनी दादी जानकी जी द्वारा 

मम्मा की विशेषताएं-दादी जानकी द्वारा | कैसी थी मम्मा? मम्मा का न्यारे और प्यारेपन का बैलेंस!!

अभी भी जो बाबा से इशारे मिल रहे हैं उन्हें दिल से स्वीकार करो। शिवबाबा वरदाता, ब्रह्माबाबा भाग्यविधाता है, मम्मा क्या है? हमको प्रैक्टिकल बनाने वाली भगवत माँ है। अलर्ट, एक्यूरेट, आलराउंडर, एवररेडी- ऐसा बनने के लिए तो-तो नहीं करना..... लेकिन बनना ही है हमको। जो बड़े कहें वह करके दिखाना है। 
मीठे बाबा ने जो कहा, मम्मा ने उसे अपने स्वरुप से दिखाया। बाबा से जो कुछ सुना, उसे समाया और स्वरुप में लाया। एक बार हमने पूछा, मम्मा, आप क्या पुरुषार्थ करती हो? मम्मा ने कहा, मैं सदा मन को प्लेन रखती हूँ। तब से यह ध्यान रहता है कि कुछ भी हो जाये मुझे भी मन को प्लेन रखना है,कभी व्यर्थ के ख्यालातों से मन भारी नहीं करना है। मम्मा के चेहरे पर कभी आश्चर्य के चिन्ह नहीं देखे, मां को ड्रामा का पाठ बहुत पक्का था। उन्हें साक्षी होकर हर सीन देखने की इतनी अच्छी आदत थी जो कोई भी दृश्य देखते कभी हलचल में नहीं आई। सदा एकरस, मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा। वही आदत हम सबको भी डालनी है। 
मम्मा का सबसे बड़ा गुण था हाँ जी, जी बाबा..., मम्मा ने कभी भी दूसरा शब्द नहीं बोला। हमें भी बाबा की श्रीमत में सदा हाँ जी, हाँ जी करना है। मनमत नहीं मिलानी है। मम्मा ने कभी नहीं कहा होगा कि यह कैसे हो सकता है! यह ऐसा है, वह वैसा है। कभी किसी के सामने किसी बच्चे का अवगुण वर्णन नहीं किया इसलिए मम्मा नंबरवन चली गई। ऐसी मीठी माँ को हम सबको भी फॉलो करना है। 
मम्मा हमेशा कहती थी, यह भी आशा क्यों रखते हो की यह अच्छा बने, वह अपने आप अच्छा बनेगा, पहले तुम अच्छे बनो। दूसरों की जिम्मेवारी लेने की बजाय पहले अपनी जिम्मेवारी लो। इसमें मुख्य बात याद रहे कि बाबा मुझे बना रहा है, मुझे अब बनना है, इसमें किसी को न देख करके खुद को सम्पन्न और सम्पूर्ण बनाना है। फिर सच्चाई और स्नेह से सबका सहयोगी बनना, यह मेरा फ़र्ज़ है। 
मीठी मम्मा कहती थी, जो करना है अभी कर लो। मम्मा का विशेष स्लोगन था, हर घडी अंतिम घड़ी है, कल तो काल का नाम है, कल पर कुछ भी नहीं छोड़ना। मम्मा के ये बोल सदा याद रहते हैं कि हुक्मी हुक्म चला रहा है। कभी मन की मत या परमत का प्रभाव मम्मा पर नहीं पड़ा। एक बार साथ बैठी थी तो मम्मा ने पूछा, जनक, तुम्हें याद रहता है कि जहान मुझे देख रहा है। उस समय तो जहान का ज्ञान भी नहीं था लेकिन आज अनुभव होता है कि सारा जहान कैसे हम लोगों को देख रहा है इसलिए अपने एक-एक संकल्प, बोल और कर्म पर पूरा ध्यान रहता है। 
मम्मा ने कभी मुरली मिस नहीं की। बाबा की मुरली के लिए अगर कोई कहता की इसका मतलब यह है या बाबा ने ऐसा क्यों कहा? तो मम्मा उसे आँख दिखाती थी। बाबा ने कहा माना सत वचन है, उसमें कोई प्रश्न उठाना, यह भी डिसरिगार्ड है। मम्मा, बाबा के एक-एक बोल को बहुत रिगार्ड देती थी। मम्मा को सवेरे दो बजे उठकर एकांत में बैठ विशेष तपस्या करने का अभ्यास था, वह रात को उठकर छत पर चली जाती और एकांत में बाबा से मीठी रूहरुहान करती। 
मम्मा की विशेषताएं-दादी जानकी द्वारा | कैसी थी मम्मा? मम्मा का न्यारे और प्यारेपन का बैलेंस!!

हर कारण का निवारण मम्मा-बाबा ने बड़ी शांति से किया है। विघ्न तो शुरू से अनेक आते रहे है पर मम्मा के सदा यही शब्द सुने कि बाबा का काम है, सब ठीक हो जाएगा, तुम बच्चे अपने किले को मज़बूत बनाओ। 
मम्मा ने बाबा सामान बनने  का बहुत गहरा पुरुषार्थ किया। बाबा मुरली लिखकर देते, मम्मा उसे पढ़कर सुनती, फिर उस पर गहरा मनन-चिंतन करके स्पष्ट करती, एक शब्द का भी पूरा विस्तार करती जिसे नया भी सुनकर समझ जाए।  
बाबा बूढ़ा,मम्मा जवान, इतनी छोटी उम्र में इतना पुरुषार्थ! वृद्ध शरीर में होते हुए भी बाबा का इतना पुरुषार्थ! वन्डर है।  कोई नहीं कह सकता है कि मैं नहीं कर सकता। बच्चा भी कर सकता है, देखो, हमारी मीठी गुलज़ार दादी बचपन से आयी, सच्चाई-सफाई और निश्चिन्त जीवन से बाबा का रथ बन गई। दादा विष्वकिशोर अधरकुमार, पुरुषार्थ करके  सबके लिए मिसाल बना। बाबा कहता था, यह मेरा वारिस बच्चा है। सदा बाबा का राइट हैंड बनकर रहा। हम अपने बड़ों से बहुत कुछ सीखते आये हैं। उन्हें भी फॉलो करें तो बाप समान बन सकते हैं।  
ज्ञान का सार है चुप रहना। मम्मा के जीवन में यह प्रैक्टिकल धारणा देखी। मम्मा का विशेष गुण था धीरज और गंभीरता। ज्ञानी तू आत्मा की ये पहली निशानी है कि वह ज्ञानमूर्त और गुणमूर्त रहे। गुणों का कर्म और संबंध से पता चलता है। 
मम्मा मुख से बाबा-बाबा नहीं कहती थी पर रिगार्ड बहुत था। पढ़ाने वाले के लिए रिगार्ड, समय पर क्लास में आना,अमृतवेला करना। सच्चा पुरुषार्थ करने वाला औरों को भी प्रेरित करता है, उसको देख करके लगता है, मैं भी ऐसे करूँ। हम भी अपनी बैठक, बोल, चलन पर ध्यान रखें, अपने लिए भी पुरुषार्थ में अच्छी भावना रखें तो बाबा हमारे में शक्ति भर देता है। हम भी बाबा-मम्मा के समान बन सकते हैं। 
मीठी मम्मा गॉडेस ऑफ़ विजडम थी, मम्मा सेकण्ड में समझ जाती कि अभी इसको व्यर्थ ख्याल आ रहे हैं। सामने बिठाकर व्यर्थ को ऐसे खत्म कर देती, जो उसे व्यर्थ ख्याल आवे ही नहीं। अकल ही न हो परचिंतन करने की या बीती को याद करने की। 
मम्मा की तबीयत जब थोड़ी ठीक नहीं थी तो मम्मा पूना में हमारे साथ डेढ़ महीना रही। मम्मा के चेहरे से कभी लगता ही नहीं था कि मम्मा को कोई तकलीफ है। मम्मा, बाबा की मुरली रोज़ पढ़ती थी, नोट्स भी पढ़ती थी, फिर टेप भी सुनती थी। एक बार मम्मा टेप सुन रही थी, उसमें था मात-पिता बापदादा का यादप्यार, तो हमने कहा,'यह (मम्मा) माता, वह पिता.... ' तो मम्मा ने कहा, नहीं,  हम सबका मात-पिता वह है। 
मम्मा अंतिम  दिनों में बैंगलोर गई थी, वहाँ सभी को ऐसा प्यार दिया, जो छुट्टी नहीं दे रहे थे, सभी आंसू बहा रहे थे लेकिन मम्मा बिल्कुल न्यारी। मम्मा के जीवन में न्यारे और प्यारे-पन का बहुत अच्छा बैलेंस था। 
मम्मा हमेशा कहती थी,  जब भी कोई शिक्षा मिले तो उसको संभाल कर रखना। कभी यह ख्याल न आये, यह   शिक्षा मुझे क्यों मिली, मेरी भूल तो नहीं थी। शिक्षा बड़ी काम की होती है, समय पर काम आएगी।मुझे भी कभी, कहाँ से शिक्षा मिली तो संभाल के रखी है। विचार नहीं किया कि यह कौन है मुझे शिक्षा देने वाला, नहीं। सीखने की भावना मम्मा ने पैदा की।    
यज्ञ में भण्डारी की सिस्टम मम्मा ने शुरू कराई। मम्मा को ब्रह्मभोजन का बहुत महत्त्व था। विशेष मम्मा अपने हाथों से भोग बनाती थी। कैसे बाबा के लिए प्यार से, शुद्धता से भोग बनाना और लगाना चाहिए, उसमें कितनी श्रेष्ठ भावना होनी चाहिए, यह मम्मा से प्रैक्टिकल में सीखा है। मम्मा कहती, भोलानाथ का भण्डारा  है, ब्रह्मा भोजन है, इस भोजन के लिए देवताओं को भी कदर रहती है इसलिए कभी ब्रह्मभोजन व भोग का डिसरिगार्ड नहीं करना चाहिए। यज्ञ का एक-एक दाना मोहर के समान है, इसे व्यर्थ नहीं गंवाना। 

ॐ शांति।  

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