How to be happy | How to be happy alone | ख़ुशी है अमूल्य खज़ाना | पराधीन सपनेहु सुख नाही | मैं कौन हूँ, किसका हूँ? रोल से अटैच होना ही दुःख है |

ख़ुशी है अमूल्य खज़ाना

How to be happy | How to be happy alone | ख़ुशी है अमूल्य खज़ाना | पराधीन सपनेहु सुख नाही | मैं कौन हूँ, किसका हूँ? रोल से अटैच होना ही दुःख है |

यादगार शास्त्र महाभारत में प्रसंग है कि यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा, संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि व्यक्ति प्रतिदिन जीवों को देह त्याग कर इस संसार से जाते हुए देखता है, फिर भी सोचता है कि मैं कभी नहीं मरूंगा, यही सबसे बड़ा आश्चर्य है। जिस व्यक्ति को यह याद रहता है कि मैं यात्री हूँ और मुझे जाना है तो वह सबसे मिलकर चलता है और खुश रहता है। ज़िंदगी का सफर पूरा होने की स्मृति उसे देह और इन्द्रियों से न्यारा कर देती है। ऐसा व्यक्ति अपने मूल अस्तित्व के करीब आता है अर्थात आत्म-स्वरुप को पहचानकर उसमें टिका रहता है। वह अपने में रमण करते हुए, अपने से बातें करता है और अपने आपके साथ ही असीम तृप्ति महसूस करता है।


पराधीन सपनेहु सुख नाही

ऐसे व्यक्ति को कहते हैं आत्मनिर्भर(सेल्फ इंडिपेंडेंट) नहीं तो वो परनिर्भर रहता है और सोचता है, इसके साथ, उसके साथ बातें करूँ; यह साथी चाहिए, वह साथी चाहिए; वह सहयोगी बने, वह सहयोगी बने। परनिर्भर अपनी ताकत को नहीं पहचानता और दूसरों से सहयोग की अपेक्षा रखता है परन्तु दूसरे भी तो उसी की तरह खाली है। जब चाहना पूरी नहीं होती है तो ख़ुशी गायब हो जाती है। दो व्यक्ति अपने-अपने हाथ में खाली कटोरे लिए आमने-सामने खड़े हैं। पहला कहता है, तुम कुछ डालो न मेरे कटोरे में। दूसरा कहता है, नहीं, पहले तुम कुछ डालो न। भावार्थ यह है कि हम दूसरे को कहते हैं कि पहले आप मेरा कहना मान लो, मुझे बहुत ख़ुशी होगी। दूसरा कहता है, नहीं, पहले आप मेरा कहना मान लो, मुझे बहुत ख़ुशी होगी। अब मेरी ख़ुशी आप पर आधारित है और आपकी ख़ुशी मुझ पर आधारित है। ना आप स्वतंत्र, न मैं। दोनों बंधे हुए हैं। दोनों ही खुश नहीं है। तो कौन किसको ख़ुशी देगा?
व्यक्ति पहले अपनी भावनाओं में स्वनिर्भर बनें। अपने आपसे सबकुछ लेना सीखे, शेयर करना सीखे, इसको कहते हैं स्वतंत्रता। नहीं तो वो परतंत्र है और परतंत्र के लिए कहावत है, पराधीन सपनेहु सुख नाही। पराधीन कभी मुस्कुरा नहीं सकता। स्वाधीन का अर्थ है स्व+अधीन अर्थात जिसकी सारी इन्द्रियां आत्मा के अधीन है। जब आत्मा इन्द्रियों की गुलामी से मुक्त हो तो वह कहीं भी रहते खुश रह सकती है। 


मैं कौन हूँ, किसका हूँ?

ख़ुशी अमूर्त भाव है। यह कोई स्थूल चीज़ नहीं है। यह अनुभव किया जाने वाला भाव है। अमूर्त चीज़ की प्राप्ति किसी मूर्त चीज़ से कैसे हो सकती है? वह किसी वस्तु, पदार्थ या भौतिक चीज़ से उपलब्ध कैसे हो सकती है? उसकी पूर्ति का आधार कोई अमूर्त शक्ति है। वो है अपने स्वरुप में टिकना, अपने स्वरुप की सुंदरता और अमरत्व को देखना। अपने मूल उद्गम को याद करना कि वह तो शांति, आनंद, प्रेम में है। हम याद करें कि मेरा मूल घर शान्तिधाम है, जहां मेरे में ये सारे गुण पर्याप्त थे। दूसरा, यह याद करें कि मैं किसका हूँ? मैं उसका हूँ जो इन सब गुणों का स्रोत है। लेकिन यह बातें तब याद रहेंगी जब हम आत्म स्वरुप टिकेंगे। मैं देह के स्वरुप में टिका हुआ हूँ तो मुझे याद आता है कि मेरा घर छोटा है, मैं गरीब हूँ, मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मैं बीमार रहता हूँ, मेरी कोई सेवा नहीं करता लेकिन यह तो मेरा रोल है और ये रोल की उपलब्धियां या कमीयाँ हैं। रोल हमेशा अस्थायी होता है। उससे एक्टर को फर्क नहीं पड़ता। यदि मैं रोल को केवल रोल समझूं और उससे डिटैच हो जाऊँ और अपने मूल रूप में स्थित हो जाऊँ, तो मेरी खुशियों को कोई छीन नहीं सकता। मैं तो वो आत्मा हूँ जो सर्वशक्तिवान की संतान है। उसकी सर्वशक्तियों पर मेरा हक़ है, यह याद आया तो ख़ुशी आ गयी। रोल स्वरुप हुई तो ख़ुशी गई। 


रोल से अटैच होना ही दुःख है

यह ज्ञान सबको है कि सृष्टि रंगमंच है और हम पार्टधारी हैं लेकिन फिर भी मनुष्य रोल कॉन्ससियस हो जाता है और उसकी कमी को अपनी कमी और उसकी खूबी को अपनी खूबी मान लेता है। मान लीजिए, एक व्यक्ति को रामलीला में राम का पार्ट बजाना है। जब वह रंगमंच पर जाता है तो उसे सोने का मुकुट और सोने के कपडे पहनाकर, सोने के सिंहासन पर बिठाया जाता है। ये वस्त्र और आभूषण उसके रोल की उपलब्धि हैं लेकिन वो भ्रमित होकर यह मानने लगता है कि मैं राम ही हूँ और ये वस्त्र-आभूषण मेरे ही हैं। यह सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि वह एक गरीब घर का लड़का है और दो घंटे के लिए राम बना है। अब जब उसका रोल पूरा हुआ तो निर्देशक कहता है कि ये कीमती वस्त्र और आभूषण उतारकर यहीं रख दो। वह दुखी हो जाता है यह सोचकर कि  ये कीमती वस्त्र और आभूषण मुझे छोड़ने पड़ेंगे! इस दुःख का इलाज क्या? वह भगवान के मंदिर में जाता है और कहता है, प्रभु कुछ ऐसा करो की मुझे यह सिंहासन छोड़ना न पड़े। पर क्या भगवान कुछ कर सकते हैं? फिर वह किसी नामीग्रामी व्यक्ति के पास जाता है कि मेरी सिफारिश लगा दो कि मुझे सिंहासन छोड़ना न पड़े। फिर वह निर्देशक के चरण पकड़ लेता है, रो लेता है परन्तु क्या उसकी कोई  भी युक्ति काम आएगी? सत्य को स्वीकार करने के अलावा और कोई तरीका काम नहीं आ सकता। सत्य यह है कि तुम जिस रूप में रोल करने के लिए आये थे, उसी पुराने रूप को धारण करके वापस चले जाओ, तो किसी सिफारिश व युक्ति की ज़रूरत तुम्हे पड़ेगी ही नहीं और न तुम्हें दुखी होना पड़ेगा। तो ख़ुशी गुम होने का कारण है सृष्टि रंगमंच के रोल से अपने को अटैच कर लेना। इस दुःख का कोई सांसारिक इलाज है ही नहीं। 


दुःख है स्वरुप विस्मृति के कारण 

मेरे रोल में मुझे गरीबी मिली है और मैंने उसे असली गरीबी मान लिया। फिर मैं ईर्ष्या करता रहा कि मुझे धन नहीं मिला  और दूसरे को इतना धन मिला। भगवान से कहूं कि मुझे अमुक संबंधी से धन दिला दो लेकिन भगवान कहते हैं, तुम गरीब हो ही नहीं, तुम्हारे अंदर तो सारी शक्तियां हैं। ईश्वर का बल तुम्हारे पास है। तुम उसको देखो। रोल कॉन्ससियस क्यों होते हो? तो दुनिया में लोग जिसे सुख कहते हैं वह मात्र स्वरुप विस्मृति है, भ्रम है। वह लाइलाज है। तुम डिटैच हो जाओ, दुःख खत्म। जो डिटैच हो गए, उनका दुःख खत्म हो गया। उन्होंने यही विधि अपनायी। जैसे अंधकार का अस्तित्व नहीं है, ऐसे ही दुःख का अस्तित्व नहीं है। विस्मृति ही दुःख है और स्मृति ही ख़ुशी है। जैसे ही स्मृति आयी कि मैं आत्मा सर्वशक्तिवान की संतान हूँ, पार्टधारी हूँ तो उसी शरीर में, उसी रोल में, उसी स्थान पर, उन्हीं मित्र-सम्बन्धियों के बीच ख़ुशी आ गयी। जैसे अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश का बटन ऑन  करते हैं, ऐसे ही दुःख को मिटाने के लिए स्मृति का बटन ऑन करें।   

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