How to connect to god? Connection with God! हाथ नहीं, मन जोड़ें! आकार दें अपने विचारों को | मन को करना है मनमनाभव | दिशा के अभाव में भटक जाते हैं पैर

हाथ नहीं, मन जोड़ें!

How to connect to god? Connection with God! हाथ नहीं, मन जोड़ें! आकार दें अपने विचारों को | मन को करना है मनमनाभव | दिशा के अभाव में भटक जाते हैं पैर

हम सभी की अधिकतर यह शिकायत रहती है कि हम सोचना तो अच्छा चाहते हैं पर पता नहीं बुरे विचार, हीन विचार क्यों आ जाते हैं, न चाहते भी भीतर क्यों प्रवेश हो जाते हैं? आत्मा मालिक की तीन शक्तियों में से एक शक्ति है मन अतः  इसे मालिक के वश में तो रहना ही चाहिए। जैसे हम अपनी स्थूल इन्द्रियों को वश में कर सकते है, आँखों को मर्ज़ी से खोल-बंद कर सकते हैं, हाथों को स्वेच्छा से स्थिर या कार्य में नियोजित कर सकते हैं, ऐसे ही मन भी आत्मा की एक सूक्ष्म इन्द्रिय है, इसे भी अपनी ज़रूरत अनुसार कहीं लगा या हटा सकते हैं, इसके विचारों की दिशा को बदल सकते हैं, गति को धीमा कर सकते हैं।यही जीवन जीने की कला है। यदि यह कला नहीं सीखी तो बाकी का सीखा हुआ सबकुछ मिलकर भी जीवन को आनंदमय नहीं बना सकेगा। जिस आत्मा का अपना मन कहना न माने, दुनिया में उसका कहना कोई नहीं मानेगा। जिस दिन मन मुट्ठी में हो जाएगा, दुनिया मुट्ठी में आ जाएगी। 

आकार दें अपने विचारों को 

हमारे विचार के बल से हमारा शरीर चल रहा है। सुबह से शाम तक शरीर के अंदर भी और शरीर के बाहर भी सैकड़ों क्रियाएं चलती हैं। मन ने विचार दिया, उठो और शरीर ने अनुकरण किया। मन ने विचार दिया, सोओ, शरीर ने उसका भी  अनुकरण किया। सारा जीवन ही विचारों से निर्मित है। कइयों को विचार आता है कि अमुक ने मुझे आगे बढ़ने में, जीवन में कुछ कर दिखाने में सहयोग नहीं दिया परन्तु इस दुनिया में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि जिनको बाहरी जगत में सब कुछ सुलभ था परन्तु अंतर्जगत अर्थात मन के विचार कमज़ोर होने के कारण सुलभ को भी दुर्लभ बना बैठे। अतः हमने जीवन में जो पाया वो सशक्त विचारों के बल से और जो खोया वो अशक्त विचारों के कारण। कोई व्यक्ति न हमें कुछ दे सकता है और न ही हमसे कुछ छीन सकता है। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है। जब विचार ही हमारे भाग्य निर्माता हैं तो वे कैसे होने चाहिए? यह हमें ही निर्धारित करना है। हम जीवन की बाकी चीज़ों को आकार देने के बजाय क्यों न सबसे पहले अपने विचारों को आकार दें। इस सूक्ष्म कार्य को सम्पन्न करने वाला विषय है आध्यात्मिक ज्ञान।  


विनिमय भगवान के साथ

मान लीजिये, हमारे घर में सांप या बिच्छू घुस आये तो क्या हम हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे, कदापि नहीं। या तो घर से हम निकलेंगे या उन्हें निकालेंगे, उनके साथ नहीं रहेंगे परन्तु जो व्यर्थ और विकारी विचार हैं वे तो इनसे भी ज्यादा जहरीले हैं, फिर हम उनके साथ कैसे जी रहे हैं, क्या हम उनसे भयभीत नहीं होते? उन्हें निकालने के लिए इतने तत्पर क्यों नहीं होते? हमारा बहाना होता है कि व्यर्थ, विकारी, पुराने, बासी विचार अपने आप आते हैं, हमारे ना चाहते भी आ जाते हैं।  यह जहरीले प्राणी भी तो बिना बुलाये आये थे, फिर भी पुरुषार्थ करके इन्हें निकाला न। इसी प्रकार, ज़हरीले विचारों को भी भगाने का पुरुषार्थ कीजिये। इसके लिए आध्यात्मिक ज्ञान का खज़ाना अपने अंदर भरिये। जैसे स्वच्छ जल को नल के नीचे रखते  ही बाल्टी का पुराना गंदा जल अपने आप निकल जाता है, उसी प्रकार ईश्वरीय ज्ञान धारण करने से व्यर्थ, विकारी विचार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
ज्ञान धन के अभाव में ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, परचिंतन, मोह, लोभ, अहंकार को ही हमने अपना धन-दौलत बना लिया है, जैसे कि छोटा नादान बच्चा पोटली  कंकर-पत्थर इकट्ठे कर लेता है। उसकी माँ कहती है, बेटा , फेंक दे, तो रोता है। फिर माँ कहती है, इनके बदले मैं तुझे सुंदर खिलौना दूंगी तो कई बार मान जाता है, कई बार नहीं भी मानता। इसी प्रकार भगवान भी  हमें कहते हैं, बेटा, इस ईर्ष्या, द्वेष.... की पोटली के बदले में मैं तुमको सुख की नींद दूंगा, निरोगी काया और लम्बी आयु दूंगा, सुख-शांति-समृद्धि से भरपूर कर दूंगा, मानव से देव बना दूंगा, ये मुझे समर्पित कर दे। तो हमें केवल विनिमय करना है। बुरा देकर अच्छा पाना है। कख के बदले लख मिल रहा हो तो सोच-विचार किस बात का। 


कण जितना मन, मण जितना क्यों?

एक शरीर में अंग तो अनेक होते हैं पर मन तो एक ही है। इन् अंगों में से किसी अंग में कभी कोई बीमारी लग जाती होगी परन्तु मन का रोगी तो आज बच्चा-बच्चा हो गया है। तनाव मन में, चिंता मन में, दुःख मन में,कड़वाहट मन में, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध मन में.....इतनी चीज़ें भरी हैं मन में, तो कण जितना मन, मण जितना होगा की नहीं? हम शरीर के सभी अंगों को जानते हैं, संवारते हैं, श्रृंगारते हैं परन्तु दर्द भरे मन की न खबर, न जानकारी। बिना जानकारी वाली चीज़(मन) को सँवारे कैसे? संभाले कैसे? डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो भी मन के बजाय शरीर की जांच करके दिलासा दे देता है कि आप बिल्कुल ठीक हैं, शरीर के सभी अवयव स्वस्थ हैं, उसने भी मन को नहीं मापा। मन को  मापने का कोई यंत्र उसके पास है ही नहीं। बीमार सॉफ्टवेयर है और वह परिणाम हार्डवेयर के दिखा रहा है, दर्द से मुक्ति मिले कैसे? 


मन को करना है मनमनाभव 

फिर इस दर्द को लेकर मंदिर में जाते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं, भगवान, मन बड़ा अशांत है, नींद नहीं आती, शांति दो। भगवान के सामने हाथ जुड़े हुए हैं पर दर्द तो मन में है, मन है कहाँ? उसे भगवान के आगे किया क्या?नहीं।  हाथ, शरीर, आँखें सब भगवान के सामने है, सिर्फ मन गायब है। भगवान पूछते हैं, दर्द वाली चीज़ को सामने लाओ पर वह तो मंदिर में आया ही नहीं। विचार कीजिये, बिजली(लाइट) कैसे आती है? जब पावर हाउस वाले तार के साथ हम अपने बल्ब का तार जोड़ते हैं तब बिना बोले बिजली आ जाती है। हम तारों को जोड़ें नहीं और हाथों को जोड़कर खड़े रहें कि लाइट हाउस बिजली दो, बिजली दो, आ जाएगी क्या? नहीं ना। इसी प्रकार हम जीवन भर हाथ जोड़ते रहे पर मन जोड़ा क्या? भगवान के साथ मन जोड़ा नहीं, शांति के सागर से कनेक्शन जुटा नहीं तो शांति मिले कैसे? स्थाई शांति न घर में मिली, न मंदिर में, न डॉक्टर के पास क्योंकि बीज में पानी डाले बिना पत्तो को ही सींचते रहे। बीज है मन, उसे शांति से सींचना है, उसे मनमनाभव करना है, यही गीता के भगवान का आदेश है। 


दिशा के अभाव में भटक जाते हैं पैर 

एक बार एक बालक का, जो अनाथ था, किसी सड़क दुर्घटना में एक पैर कट गया। कुछ दयाली समाजसेवियों ने उसको कृत्रिम पैर लगवा दिया, यह सोचकर की बालक पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बन जाये। परन्तु 10 साल बाद जब उन्हें पता चला कि वह बालक, जो अब नौजवान हो चूका है, जेल की सज़ा भुगत रहा है, तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि हमने तो बहुत खर्चा करके उसे पैर लगवाया था, यह कैसे हो गया? किसी ज्ञानवान ने उन्हें समझाया कि आपने तो केवल पैर दिया था परन्तु पैर से जाना किस दिशा में है, वो दिशा तो नहीं दिखाई थी ना। आज भारत की जेलों में 10 लाख कैदी है। उन् सबको पैर है। क्या पैर होना प्रयाप्त है? क्या उन पैरों को दिशा नहीं चाहिए ? दिशा के अभाव में पैर होते भी हम भटक जाते हैं। विज्ञानं पैर दे देता है पर दिशा देने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान चाहिए। 

 ॐ शांति।   

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