बनें हम परमात्मा का चैतन्य चित्र | धर्म का अर्थ है धारण करना | हममें वो दिखाई दे | जैसा पिता वैसा पुत्र | हमें देख प्रभुपिता की याद आये

बनें हम परमात्मा का चैतन्य चित्र

बनें हम परमात्मा का चैतन्य चित्र | धर्म का अर्थ है धारण करना | हममें वो दिखाई दे | जैसा पिता वैसा पुत्र | हमें देख प्रभुपिता की याद आये

संसार का इतिहास बताता है कि समय प्रति समय इस सृष्टि-रंगमंच पर अनेकानेक धर्मात्माएं, महात्माएं, समाज-सुधारक, वैज्ञानिक, साहित्यकार आते रहे हैं और समाज को उस समय के अनुरूप आवश्यक मूल्यों को ज्ञान और शिक्षा देते रहे हैं। संसार-चक्र में मध्ययुग-द्वापरयुग में जब हम मनुष्यात्माएं वाम मार्ग में जाते हैं और जीवन के नियम-संयम कमज़ोर होने लगते हैं तब दूर पश्चिम की ओर, प्रथम धर्म- इस्लाम धर्म के आदि पितामाह अब्राहम जी तथा उसके बाद मोहम्मद पैगंबर साहब ने आकर संसार को जीवन की श्रेष्ठ धारणाओं के नियम सिखाये और उन्हें कानून का रूप देकर सख्ती से पालन भी करवाया।इस प्रकार कर्म में धर्म के समन्वय का प्रयास किया गया। लेकिन समय बीतने के बाद आज हम देखते हैं कि उस मार्ग पर चलने वाले करोड़ों लोग होते हुए भी उनमें ही अराजकता, अशांति, लड़ाई-झगड़े और युद्ध होने लगे हैं। लोग लकीर के फ़क़ीर बन गए हैं लेकिन धर्म की धारणा से जो उदारता, विशालता, रहम  सहयोग की भावना आणि चाहिए वो नहीं है।

और आगे देखें तो यहूदी परिवार में पैदा हुए जीसस क्राइस्ट ने आकर प्रेम और भाई-चारे का पाठ सिखाया और उस समय के समाज में व्याप्त सितम-जुल्म से लोगों को मुक्त करने का प्रयास किया। आज विश्व में क्राइस्ट  को मानने वालों की संख्या सबसे अधिक है लेकिन उनमें भी वैर-द्वेष, सत्ता की लालसा और धन की लोलुपता बढ़ती ही जा रही है।

पूर्व की ओर भारत में देखें। मध्ययुग में धर्म के नाम पर अंधश्रद्धा, हिंसा, पशुबलि-नरबलि बढ़ गई तब महावीर स्वामी ने आकर अहिंसा, जीवदया और जितेन्द्रियता के पाठ सिखाये लेकिन आज उनको मानने वाले लोगों में भी निरा स्वार्थ और अति परिग्रह वृत्ति आ गई है।

तथागत गौतम बुद्ध ने भी मैत्री, करुणा, अहिंसा  सिखाये और समाज को खाली पांडित्य, निरी विद्वता से निकाल मूल्यों की धरना, इच्छाओं का निग्रह,सदव्यवहार तथा जीने का अष्टांग सम्यक मार्ग दर्शाया  लेकिन सदियों के बाद, उसके पीछे चलने वाला वर्ग तथागत बुद्ध के सारभूत सन्देश को भूल गया है। पुनः वे सभी लोग अलौकिक सिद्धियों तथा चमत्कारी विधियों में उलझे गए हैं।

धर्म, अध्यात्म, योग के नाम पर क्रियाकांडों में खोया हुआ एक विशाल वर्ग, धर्म की बातें-चर्चाएं तो करता है लेकिन धार्मिकता-मानवता-सच्चरित्रता उनमें बिल्कुल दिख नहीं रही है।

अनासक्त कर्मयोगी जीवन पद्धति का "गीताज्ञान" नित्य अध्ययन करने वाला विशाल वर्ग आज तक भी जीवन को "गीता" नहीं बना पाया है। "जीवन एक प्रभु वरदान है, सुंदरतम उपहार है"- ऐसा वर्णन करने वाले लोग और ही अपने जीवन को संकुचित, रसहीन और उदास बना बैठे हैं और ब्रह्मचार में अधिकतर समय, शक्ति, धन खर्च करते हुए नज़र आते हैं।

सृष्टि-रंगमंच पर आकर अपने-अपने धर्म की स्थापना करने वाले महानुभावों को मानने वालों में यह दुराग्रह है कि धर्म-स्थापक ही श्रेष्ठ है, हमारा धर्म ही उच्च है, हमारे धर्मशास्त्र ही सत्य है, हमारे तीर्थस्थान ही पवित्र हैं। ये ही कारण है की आज विश्व में इतने धार्मिक लोग हैं, हर धर्म के इतने अनुयायी हैं फिर भी संसार का वर्तमान बहुत ही धुंधला, घृणास्पद और डरावना है। 


धर्म का अर्थ है धारण करना 

संसार का सर्वश्रेष्ठ बुद्धिशाली प्राणी मानव कई प्रकार के तनाव, टकराव, अभाव व अवसाद से ग्रस्त हो गया है। वास्तव में जिनके आदेश में सच्चाई लगती है, जिनसे हम प्रभावित होते होते हैं, हम उनके केवल शब्दों को पकड़ कर रखते हैं। बस, इतना करने मात्र से धर्म नहीं हो जाता है। धर्म का अर्थ तो धारण करना है। धर्म कोई प्रचार, स्पर्धा या दिखावा करने का नाम नहीं है। धर्म तो स्वयं के व्यवहारिक जीवन से श्रेष्ठ परिणाम दिखाने कि शुभ रीति है।  


हममें वो दिखाई दे 

हमें तो अपने अति प्रिय परम इष्ट परमात्मा को अपने जीवन द्वारा, मन-वचन-कर्म द्वारा, भाव-भावना व संवेदनाओं द्वारा अभिव्यक्त करना है। परमात्मा  पिता के सर्वोच्च सद्ज्ञान को, सभी ईश्वरीय गुणों को, उनकी समस्त रूहानी शक्तियों को अपनी ज़िंदगी में समाविष्ट करना है। हमें तो उस अविनाशी, सर्वोच्च रचयिता की सुंदर अविनाशी रचना बनना है। हमें इतना पवित्र, शांत, सत्य, प्रेमरूप, आनंदमय बनना है जो हममें वो दिखाई दे। हम उनके प्रत्यक्ष प्रमाण बन जाएं। परन्तु जीवन की सच्चाई आज ये है कि हम परमात्मा को मानते हैं परन्तु परमात्मा की नहीं मानते।  


जैसा पिता वैसा पुत्र 

वास्तव में जिससे हमारा सच्चा प्यार होता है उनका तो हमें हर कदम अनुसरण करना होता है। परमात्मा हमारा पिता है तो जैसा पिता वैसा ही पुत्र होना चाहिए। जैसा रचयिता, वैसी उसकी रचना। रचयिता की कमियां या विशेषतायें रचना में भी आती हैं। माता-पिता के गुण, लक्षण, शारीरिक खामियां उनके बच्चों में भी आती है। इसी प्रकार, आध्यात्मिक दृष्टि से भी यही बात हम सोचें। अवश्य ही हम आत्माएं अपने अनादि स्वरुप में परमात्मा पिता जैसे ही गुणमूर्त होने चाहिए और हैं ही। अगर परमपिता परमात्मा के हम सपूत न बनें, परमशिक्षक के सुपात्र विद्यार्थी न बनें, परमसद्गुरु के सम्पूर्ण अनुगामी न बनें तो सिर्फ परमात्मा को याद करने का और उनके नाम पर कर्मकांड करके खुश हो जाने का  क्या अर्थ रह जाता है? इसमें तो सिर्फ हमारी भावना संतुष्ट होती है कि मैं धार्मिक हूँ, बाकि उसका हमारे जीवन पर कोई स्थान सकारात्मक प्रभाव नहीं रहता है। 
परमात्मा पिता के प्रति हमारा सच्चा प्यार है, समर्पण है, सम्मान है तो हम मन-वचन-कर्म से उनका अनुसरण करें, अनुकरण करें। इतना ही नहीं, मन-वचन-कर्म से, तन-मन-धन से, सम्बन्ध-संपर्क और समय से विश्वकल्याण के दिव्यकार्य में साथी-सहयोगी भी बन जाएं। 


हमें देख प्रभुपिता की याद आये 

हम परमात्मा पिता क्र जीते-जागते मिसाल बन जाएं। उनका ज्ञान, उनकी याद, उनकी महिमा हमारे दिलोदिमाग में इतनी समायी हो जो हमें कोई देखे तो उसे प्रभुपिता की याद आ जाये। हम देखें  अंतर्मुख, आत्माभिमानी  बन जाएं। चंचल चित्त व्यक्ति हमें देखे और स्थिरमना, स्थितप्रज्ञ बन जाये। आओ, हम सभी कृत संकल्प बनें। ऐसा मनन-चिंतन, वर्णन, अध्ययन, अभ्यास, अध्यापन हम सभी करें। ऐसा पुरुषार्थ हर कोई कर सकता है। जहाँ हम रहते हैं, जिसके साथ रहते हैं, जिन परिस्थितियों में रहते हैं, उनमें रहते भी कर सकते हैं। इसमें कोई हाथ-दमन, दिखावा-दंभ, ढोंग करने की तो आवश्यकता ही नहीं है। इसमें हम किसी मनुष्य गुरु या व्यक्ति विशेष का आधार लेने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। 
हम हरेक जानते हैं की परमपिता परमात्मा शांतिदाता है, सुखकर्ता है, शक्तिदाता है, प्यार का सागर है, सद्ज्ञान दाता है तो हमारी भी हर संभव दृढ कोशिश यही रहे की हम उनके जैसे गुणवान बनते जाएं। तब हम परमात्मा के सजीव शिल्प बनते जाएंगे। 

यह पोस्ट पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। अगर अच्छी लगे तो और भी आत्माओं तक पहुंचाएं।  

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