कैसे शरीर को देखते हुए भी न देखें | हर रोज़ की प्रैक्टिस से कैसे उमंग में आएं !!

सद्गुण ही सम्पदा है!!!!


दो प्रश्न 

प्यारे शिवबाबा प्रतिदिन के ईश्वरीय महावाक्यों में हम सभी को आत्म-अभिमानी बनने का पाठ पढ़ते हैं और कहते हैं, हर आत्मा के प्रति भाई-भाई की दृष्टि रखो, यह दृष्टि ही  सर्वोत्तम दृष्टि है। इस संबंध में कई भाई-बहनो के मैं में कुछ प्रश्न भी पैदा होते हैं। एक प्रश्न तो यह है की शरीर इतना बड़ा है और आत्मा इतनी छोटी है इसलिए बड़ी वस्तु पर सहज नज़र चली जाती है,इसके लिए क्या करें? दूसरा प्रश्न यह होता  है कि प्रतिदिन वही-वही अभ्यास करते उमंग में कुछ कमी आ जाती है, इसके लिए क्या करें?


लक्ष्य पर एकाग्रता 

प्रथम प्रश्न के उत्तर में यही  कहेंगे कि जब कोई अपने लक्ष्य पर केंद्रित होता है तो उसे बाकी बातें देखते हुए भी नहीं दिखती। जैसे कोई मरीज़, जिसके पेट में गाँठ है,एक डॉक्टर के पास जाता है। डॉक्टर भले ही मरीज़ को सर से पाँव तक देखता है परन्तु उसकी एकाग्रता कहाँ है? उसका सारा ध्यान गाँठ की जांच-परख पर केंद्रित है क्योंकि उसका काम उस गाँठ से है। इसी प्रकार,किसी भी व्यक्ति को देखते हमारा काम किस्से है? सकाश देनी है, शुभभावना देनी है, शिवबाबा का परिचय देना है, ये सब कार्य तो आत्मा से ही करने है इसलिए एक बार नज़र भले ही शरीर पर जाये पर हमारे लक्ष्यों की पूर्ति आत्मा पर केंद्रित रहने से होगी। 

इसी प्रकार,एक औषधि वैज्ञानिक वन में कुछ जड़ी-बूटियां लेने जाता है। वन में हज़ारों प्रकार के छोटे-बड़े पेड़-पौधे हैं परन्तु वह उनको देखते हुए भी अनदेखा करके आगे बढ़ता जाता है और जैसे ही अपनी मनचाही बूटी को देखता है, रुक  जाता है। आँखें तो उसकी खुली है, देख तो वो सब रहा है परन्तु उसकी एकाग्रता उसकी बूटी पर है। यदि किसी पेड़ के किसी विशेष हिस्से से दवा बनानी है तो भी भले ही देखेगा सारे पेड़ को पर मन की एकाग्रता तो ज़रूरत अनुसार उसकी जड़ या छाल या फूल या पत्तों पर ही बनी रहेगी। हम भी इस सृष्टि रुपी काँटों के जंगल में प्रतिदिन  अनेकानेक मानवों के संपर्क में भले ही आते हैं परन्तु हमारा काम उन कलियुगी शरीरों से न होकर परमधाम से आयी आत्मा से ही है। उस आत्मा को परमधाम का रास्ता दिखाने से है। 

एक गृहिणी भी बाजार से आवश्यक सामान लेने जाती है तो सैकड़ों दुकानों के आगे से गुजर कर निश्चित जगह पहुँचती है। रास्ते में आये दृश्यों को देखते हुए भी अनदेखा करती जाती है क्योंकि उसे उनसे कुछ लेना-देना नहीं है। दुकान में हज़ारों प्रकार का सामान होते हुए भी वह अपनी ज़रूरत की चीज़ों पर एकाग्र रहती है और अपना समय और ऊर्जा बचती है। इसी प्रकार कितने ही उदाहरण लिए जा सकते हैं जिनमें व्यक्ति विस्तार के बिच रहकर भी सार में टिका रहता है। 


मन बहलाव नहीं, मन-परिवर्तन 


ऊपर वर्णित दूसरे प्रश्न के उत्तर में हम यही कहेंगे कि यह ईश्वरीय पढ़ाई है और  पढ़ाई में दोहराई का विशेष महत्व होता है। एक अच्छा विद्यार्थी साल भर उन्ही पाठों को दोहराता रहता है, रटता रहता है। यदि कोई उसे कहे कि  यह क्या तुम रोज़-रोज़ वही पाठ पढ़ते हो, बोर नहीं होते क्या, लाओ तुमको महादेवी वर्मा की कविताएं ला दूँ, जयशंकर प्रसाद के नाटक ला दूँ, मुंशी प्रेमचंद की कहानियां ला दूँ, तो वह क्या कहेगा? यही कि मैं यह पढ़ाई मन बहलाने के लिए नहीं कर रहा, अपना भविष्य बनाने के लिए कर रहा हूँ। यदि मन बहलाने लग गया और भिन्न-भिन्न मनोरंजक बातें पढ़ने लगा तो परीक्षा में गोल-गोल ही आएगा। 

हम भी यह ईश्वरीय पढ़ाई मन बहलाने के लिए नहीं कर रहे हैं वरन 21जन्मों  भाग्य बनाने के लिए कर रहे हैं। निस्संदेह इसमें मन बहलाव भी है, यह रूखी पढ़ाई नहीं है लेकिन केवल मन-बहलाव नहीं है, मन का परिवर्तन और मन का सशक्तिकरण भी है। इसलिए उन्हें आवश्यक पाठों को रोज़ दोहराते भी हम आनंद महसूस करते हैं क्योंकि एक तो उनकी दोहराई कराने वाला स्वयं भगवान है और दूसरा, हम स्वयं भी इस दोहराई से भरपूरता का एहसास करते हैं। 
  

मूल आवश्यकताएं नहीं बदलतीं 

फिर हम यह भी जानते हैं कि जो मुलभुत आवश्यक चीज़ें हैं वे तो रोज़ ही चाहिए होती हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता। जैसे हम भोजन में प्रतिदिन वही आता, दाल, मसाले,पानी, सब्ज़ी, चिकनाई, मीठा प्रयोग करते हैं। भोजन बनाने,खाने के बर्तन वही, डाइनिंग वही, गैस चूल्हा वही, फ्रीज वही और भी बहुत साडी बुनियादी चीज़ें वहीं रहती हैं। कभी हमने कहा कि  ये सब वही है, इनका प्रयोग करते-करते उमंग कम हो गया, नहीं न। इसी प्रकार आत्मिक भोजन में कई बुनियादी चीज़ें रोज़ लेनी अनिवार्य है। उनमें से आत्मिक भाव और परमात्म-स्मृति रुपी भोजन मूल रूप से अनिवार्य है जिसे रोज़ बुद्धि को स्वीकार करना ही है। 


गुणों पर बलिहार है रत्नराशियाँ 

एक-एक सद्गुण अरबों-खरबों-पद्मों से भी  अमूल्य है। संसार भर के हीरे-मोती-जवाहरात भी सद्गुणों के आगे पानी भरते हैं, उनकी चाकरी करते हैं। गुणवान व्यक्ति पर अनेकानेक रत्नराशियाँ कुर्बान जाती हैं क्योंकि हीरे-जवाहरात तो भौतिक जगत की जड़ सम्पदा है परन्तु दैवीगुण तो चेतन आत्मा की बहुमूल्य सम्पदा है। चेतन आत्मा की इस बहुमूल्य सम्पदा पर, जड़ जगत की हर वस्तु सदा बलिहार है ही है। 


लौट आएगी लुप्तप्राय सम्पदा 

जब मानव दैवीगुण संपन्न था तो सर्व हीरे-मोती उसके क़दमों में थे परन्तु जब वह गुणों से हीन हो गया तो हीरे मोती भी अदृश्य हो गए और मानव से उनका मूल्य अधिक हो गया। सृष्टि-चक्र का वर्तमान दृश्य ऐसा ही चल रहा  है परन्तु इस दृश्य को पलटाने के लिए स्वयं भगवान धरा पर अवतरित हुए हैं। वे हमें गुणों के गहने पहना रहे हैं जिससे लुप्तप्राय सम्पदा पुनः लौट आएगी। इस सम्बन्ध में एक बहुत सुंदर कहानी इस प्रकार है-


करुणा के अभाव में दौलत हुई अस्थाई 


एक बार भगवन अपने प्रिय भगत के साथ मृत्युलोक की यात्रा पर निकले। रस्ते में उन्होंने एक ब्राह्मण को भिक्षा मांगते देखा। भगत को दया आ गयी। उसने सोने की 100 मोहरें उस ब्राह्मण की झोली में दाल दी और सोचा, मैंने बड़ा परोपकार का कार्य कर दिया, अब यह ब्राह्मण आजीवन भिक्षा मांगने से छूट जाएगा। ब्राह्मण ने जैसे ही भिक्षा में मिली 100 मोहरें देखीं, उसकी आँखें चौंधियाँ गयी। वह उस भिक्षा को बगल में दबाकर भागने लगा। रस्ते में एक अपाहिज ने उसे पुकारा, हे ब्राह्मण, बड़ी धुप है, मुझे उस छाया वाले पेड़ तक पहुंचा दे। ब्राह्मण धन पाकर थोड़े गर्व में आ गया था। जहां गर्व है वहां करुणा उड़ जाती है और जहां करुणा रुपी गुण नहीं, वहां दौलत भी स्थाई नहीं रह पाती है। अपाहिज की आवाज़ को अनसुना कर ब्राह्मण आगे बढ़ता जाता है और एक चोर उसकी पोटली छीनकर भाग जाता है। इस प्रकार ब्राह्मण अपनी पूर्व स्थिति में आ जाता है। 


पुनः करुणा की अवहेलना 


अगले दिन भगवान और भगत फिर वहीँ से गुजरते हैं और ब्राह्मण को पुनः भीख मांगते देख कर कारण जानना चाहते हैं। ब्राह्मण साडी बात सुना देता है। भगत इस बार उसे एक अमूल्य हीरा देता है और सोचता है, इसे बेचकर तो इसकी सात पुश्तें खाती रहें, इतना धन मिल सकता है और यह भिक्षा मांगने से छूट सकता है। हीरा लेकर ब्राह्मण फिर गर्वित होता है और तेज़ गति से घर की ओर चलने लगता है। इस बार रस्ते में उसे एक प्यासा वृद्ध मिलता है, जो पानी पिलाने की प्रार्थना करता है परन्तु गर्व में चूर ब्राह्मण उसकी आवाज़ को अनसुना कर, करुणा को भूलकर, जल्दी से घर पहुँचता है। और हीरे को एक मटके में रख के सो जाता है। उसकी पत्नी उस मटके को उठाकर पानी भरने जाती है और हीरा नदी में गिर जाता है। ब्राह्मण जब जागता है तो पत्नी से हीरे के बारे में पूछता है। वह कहती है , मुझे कुछ मालूम नहीं, मैं तो मटका नदी के पानी से भरकर लायी हूँ। 

कहानी का सन्देश यह है कि द्वापरयुग से अनेक भगत आत्माएं दयाशील होकर धन-दान द्वारा गरीबी मिटने की कोशिश करती आयी है परन्तु बिना गुणों के यदि धन मिल भी जाता है तो वह गर्व पैदा करता है और सुख नहीं दे पाता। 

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