BLESSINGS | HOW TO CONNECT TO GOD | सबकी दुआएँ कैसे लें?भगवान से अपना PERSONAL रिश्ता कैसे जोड़ें ?

सबकी दुआएँ कैसे लें?भगवान से अपना पर्सनल  रिश्ता कैसे जोड़ें ? 


साइलेंस  में क्यों बैठना चाहिए? क्या होगा उससे? फ़ोकस ,माइंड सेट  हो जाता है। और क्या होता है एक मिनट साइलेंस  से? 1 मिनट साइलेंस  में बैठना मतलब परमात्मा से कनेक्ट  होना। उससे बात करना,उससे एडवाइस  लेना और उसकी एनर्जी  को अपने कर्म में इन्वाइट  करना। जैसे,कोई किचन में खाना बना रहा है,और उस समय आप रोज़ खाना बनाते हैं लेकिन आपके साथ आपका कोई बड़ा खड़ा है, तो आप उनकी तरफ 1 मिनट  ऐसे देखते हैं न, की हम सारा काम ठीक से कर रहे है या नहीं। जबकि हम रोज़ खाना बनाते हैं। लेकिन जब कोई अपने से बड़ा,अपने से अनुभवी साथ में खड़ा हो तो, हम क्या करते हैं? 1 नज़र उनकी तरफ देखते हैं,हम कहते है"सब ठीक है?" वो कहते हैं, "सब ठीक है। " तो उनसे राय लेने से क्या हुआ? क्यों राय ली, रोज़ तो खाना बनाते हैं?चैक  करो। आप कर्म कर रहे हैं,आपके साथ कोई बड़ा खड़ा है, चाहे वो किचन में हो,ऑफिस  में हो। कितने भी हम बड़े हो जाये हम अपने पेरेंट्स पूछते है, "ये ठीक है?" वो कहते- " हाँ ठीक है। " बिना पूछे भी कर सकते थे लेकिन पूछा, तो उससे क्या फ़ायदा  हुआ? एक विश्वास हो गया कि हाँ हम सही कर रहे हैं। एक चीज़ का जीवन में ध्यान रखना है। अगर खुश रहना चाहते हैं, तो हमारे कोई भी कर्म से कोई और डिस्टर्ब  नहीं होना चाहिए। जैसे,क्या हो रहा है, अगर वो सोच रहे  मुझे आगे जाके बैठना है (किसी हॉल  में), ये नहीं सोच रहे कि हमारे यहां बैठने से,हिलने से,कुर्सी हिलाने से,5000 लोग डिस्टर्ब  हो रहे हैं। आगे आके तो बैठे लेकिन 5000 को डिस्टर्ब   करके बैठे,तो उसका कुछ रिजल्ट नहीं मिलेगा। इसलिए हमेशा ये ध्यान रखना है,सारा दिन में, मेरे कोई कर्म से,किसी और का मन थोड़ा भी हिले नहीं। अगर किसी और का मन मेरे कर्म से अशांत हुआ तो मेरे मन का शांत रहना मुश्किल  है। हम बाज़ार  जाते हैं,कहते है-" 2 मिनट  में आते है", गाडी स्कूटर वहीं लगाके फटाफट जाकर आते हैं। उस समय सिर्फ किसके बारे में सोचते हैं? गाड़ी लगा दी 2 मिनट  का सोचकर,उससे कितनी गाड़ियों को ब्लॉक  कर दिया? करते समय किसके बारे में सोचा? अपनी सुविधा के बारे में सोचा। आप जब तक सामान लेकर आएंगे तब तक जिनकी गाड़ियां ब्लॉक  हुई है,वो उन् 5 मिंटो में हमे क्या देने वाले हैं? बद-दुआएं, नेगेटिव एनर्जी  . 2 महीने बीत जाएंगे इन बद-दुआओं को न्यूट्रल  करने में। किसी से भी, छोटे से छोटा व्यक्ति या बड़ा तो बिलकुल नहीं,छोटे कर्म में भी किसी से दुआओँ की अपोजिट एनर्जी (नेगेटिव एनर्जी) नहीं लेनी है। और अगर हर कर्म में दुआओं कि एनर्जी  आती रहे तो खुश रहने के लिए कुछ करना नहीं पड़ेगा। तो अगर कुछ भी कर रहे हैं ,अपने फायदे से पहले किसका फायदा सोचना है? दुसरो का। तो जब सब सुखी और शांत होंगे मन सबका संतुष्ट होगा तो उनसे हमें कौन सी एनर्जी  मिलेगी? दुआएं। अब विज़ुअलाइज़  करो, एक बैटरी जिसको यहां आस-पास से दुआएं मिलती जा रही हैं, तो जिस battery को आस-पास से पॉजिटिव एनर्जी  मिलेगी,वो चार्ज  हो जाएगी। और अगर कोई चार्ज  बैटरी है उसको आस-पास से नेगेटिव एनर्जी  मिलेगी तो वो क्या हो जाएगी? तो हमें बस ध्यान रखना है कि मेरे आस-पास से कोई नेगेटिव एनर्जी  न मिले। इसका मतलब कर्म करते वक़्त,अपना फायदा नहीं सोचना, अपने से ज्यादा दुसरो का फायदा सोचना है। मेरी वजह से किसी और का मन डिस्टर्ब न हो,ये ध्यान रख के जो आत्मा कर्म करेगी उसे सबसे ज्यादा दुआएं मिलती रहेंगी। तो कुर्सी उठाकर आगे रखने की बजाय,सबको सुख देकर सबसे पीछे भी बैठेंगे तो सबसे ज्यादा दुआएं कमाने के पात्र बन जाएंगे। लेकिन आगे बैठेंगे सबको डिस्टर्ब  करके, तो कुछ ग्रहण नहीं होगा। ये हमें सीखना है कि हमारा अटेंशन  किसपे हो? बहार कहाँ बैठें हैं वो नहीं,सबको सुख दिया या डिस्टर्ब  किया वो चेकिंग करनी है।
आज कलयुग क्यों बना? क्योंकि हम सारा दिन सिर्फ धन कमाने के बारे में सोचते हैं। अगर हम दुआएं कमाने के बारे में सोचेंगे,तो बहुत जल्दी सतयुग बन जाएगा। अब सारा दिन दुआएं कमाने के लिए क्या करना पड़ेगा? सब कुछ वही करना है जो सारा दिन में करते हैं,लेकिन दुआएं भी कमानी है तो  क्या करना होगा? दुसरो का भला करना होगा। आसान  है? हमें दूसरों का भला करने की भी ज़रूरत नहीं है बस उसका अपोजिट  नहीं करना है। वो अपना भला खुद कर लेंगे। बस किसी को डिस्टर्ब  नहीं करो। क्योंकि जो किसी और को डिस्टर्ब  करेगा,उसका खुद का मन भी डिस्टर्ब रहेगा। क्योंकि जैसा कर्म करेंगे,वैसा फल  मिलता जाएगा। अब सब की दुआओं के साथ-साथ हमें परमात्मा की भी दुआएं लेनी हैं। तो जब हम अपने बड़ो से राय लेते है कि ऐसा करें? तो वो ठीक है बोलते हैं सिर्फ, लेकिन वो ठीक है के साथ अपनी दुआएं दे देते हैं। क्यों? क्योंकि बच्चे ने उनसे पूछा। अब कई बार बच्चे सोचते हैं कि क्या सब कुछ पूछ-पूछ कर करना। हम तो बड़े हो गए हैं अब। तब भी हम सही काम ही करेंगे, लेकिन जो पुछके 30 सेकंड  में हम दुआएं कमा सकते थे,उससे वंचित हो जाते हैं। तो इसी तरह हम हर कर्म उससे(परमात्मा) पूछ-पूछ कर करें,तो क्या होगा? अभी हम यहां जा रहे हैं, वहां जाना है, आज ये मीटिंग है, आज हम उनसे मिलने वाले हैं। तो अगर हम कोई ऐसा काम करने जा रहे हैं, जो हमारे लिए सही नहीं है, वो हमें टचिंग  करा देगा,कि  इधर नहीं जाना,ये नहीं करना। ये है मैडिटेशन।मैडिटेशन मतलब परमात्मा के साथ एक डायरेक्ट पर्सनल रिश्ता। जहां हम भी बात करेंगे और वो भी बात करेगा।
क्या बिना शब्द इस्तेमाल किये बात की जा सकती है? कभी-कभी हम किसी को याद करते हैं,तो उनका फ़ोन आ जाता है कि आपको कैसे पता चला कि मैं आपको याद कर रही हूँ!! फर्स्ट कम्युनिकेशन , विचार , दूसरों को पहुँचते हैं। दूसरा कम्युनिकेशन, शब्द दूसरे सुनते हैं। तीसरा कम्युनिकेशन व्यव्हार जो लोग देखते हैं। सबसे सूक्ष्म कम्युनिकेशन जो हम सोच रहे हैं वो दुसरो तक पहुँचता है। दूसरे जो सोचते हैं वो हम तक पहुँचता है। तो अगर हम एक दूसरे के साथ थॉट  से कम्यूनिकेट कर सकते हैं तो क्या हम परमात्मा के साथ ऐसे कम्यूनिकेट नहीं कर सकते?मन में उससे बात करनी है। परमात्मा कहते है,मैं बैठा मुझे यूज़ करो। परमात्मा को सूर्य की तरह देखते हैं। वो ,वो अपनी लाइट ,पावर्स दे रहा है,ये हमारे ऊपर है कि उसकी लाइट और पावर्स को हम कितना उसे करते है। वो दे रहा है,हम ले नहीं रहे। तो जैसे वो सूर्य है,परमात्मा भी सूर्य है। ज्ञान का सूर्य,शांति का सूर्य। एक कांस्टेंट सोर्स ऑफ़ एनर्जी है। उससे माँगना नहीं होता,की दो। क्या हम कभी सूर्य से मांगते हैं की मुझे लाइट दो?क्योंकि वो तो दे ही रहा है। तो परमात्मा से क्यों मांगते हैं? शांति दो,सुख दो,शक्ति दो।  वो कांस्टेंट है,वो दे रहा है। उससे मांगना नहीं है। वो दे रहा है,हमे उससे लेकर अपने जीवन में उसे यूज़ करना है। और जब उसे करेंगे तो ख़ुशी और शांति की डेफिशियेंसी खत्म हो जाएगी। क्योंकि उससे लेते नहीं और दूसरी-दूसरी चीज़ों में शांति ढूंढते है। तो परमात्मा कांस्टेंट एनर्जी है। हमारी चॉइस है,कि हम उसको कब-कब याद करते है। आज से क्यों न भगवान से अपना खुद का पर्सनल रिश्ता जोड़ें और हमेशा खुश रहें। 

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