Addiction | Causes and solution of addiction | व्यसनों के कारण और निवारण | खालीपन | कुसंग | कमज़ोरियाँ | कुतर्क

व्यसनों के कारण और निवारण 

Causes and addiction | व्यसनों के कारण और निवारण | खालीपन | कुसंग | कमज़ोरियाँ | कुतर्क

सदियों से मानव का एक बड़ा वर्ग व्यसनों के अधीन रहा है और यह अधीनता आज अधिक विस्तृत और विकृत रूप में विश्व में प्रत्यक्ष है। व्यसनों से हुई बर्बादी और दुर्दशा के अनगिनत उदाहरण देख लेने या भुगत लेने के बावजूद भी क्या वजह है कि व्यसनों के अधीन मानव इन्हें छोड़ते नहीं है अथवा जो इनसे मुक्त हैं, सब कुछ जानते हुए भी वे इन्हें अपना लेते हैं। शासन-प्रशासन व सामाजिक तंत्रों के द्वारा व्यसनों के दुष्परिणामों से लोगों को अवगत करने के कई अभियान चलाये जाते हैं परन्तु आंशिक लाभ मिलते हैं। व्यसन-भोगियों को यदि व्यसनों की हानियां समझाई जाएँ तो वे बातों को उबाऊ भाषण की तरह भुला देते है। इससे सिद्ध है कि व्यसनों के दुष्परिणामों के ज्ञान का कोई अभाव नहीं है परन्तु कुछ निजी कमियों व कमज़ोरियों का अज्ञान ही इस गुलामी का कारण बना हुआ है। उन पर विचार करके ही व्यक्ति इन व्यसनों से मुक्त हो सकता है। मुख्य 4 कारणों के रूप में वे कमियां समाज में युवाओं और यहाँ तक कि महिला वर्ग व कुमारियों में भी देखी जा है। वे चार मुख्य कारण हैं, 1. खालीपन; 2. कुसंग; 3. कमज़ोरियाँ(मानसिक); 4. कुतर्क। 


खालीपन 


यह एक बहुत बड़ा कारण बनता है व्यसनों को अपनाने का। मनोविज्ञान का नियम है कि व्यक्ति सुखी होकर सालों जी सकता है, दुःख में भी आशा के साथ वर्षों बीता सकता है लेकिन बोरियत में, ऊब व नीरसता में बिताया हुआ एक दिन भी उसे महीनों जैसा भारी लगता है। इस खालीपन का कारण होता है अच्छे चिंतन की कमी, जीवन के लक्ष्य और उद्देश्य का निर्धारित न होना, नवीन पुरुषार्थों व रचनात्मक प्रवृत्तियों का न होना अथवा अच्छे माहौल की कमी। इसमें खासकर युवा, जो तन-मन की शक्ति से भरे हुए होते हैं, सही दिशा के अभाव में बोरियत का अनुभव करने लगते हैं और फिर रोमांच  की तलाश में व्यसनों को सहज साधन के रूप में अपना लेते हैं। 


कुसंग 

कुसंग जीवन का एक बुरा दौर है जो अच्छे से अच्छे जीवन-यात्री की राह और मंज़िल बदल देता है। कुसंग में फंसे व्यक्ति, खासकर युवा, अपने दोस्तों को खुश करने के लिए, अपने को बिंदास व बालिग़ दिखाने के लिए या कुसंगति का झूठा मज़ा लेने के भ्रम में ये शौक अपना लेते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि ये मित्र, जो आज सगे भाई जैसा अपनापन दिखा रहे हैं, केवल कुसंग में रंगने के लिए ऐसा कर रहे हैं कि आप एक बार हमारे जैसे बन तो जाओ,बाद में आपका समय, पैसा और सब कुछ स्वतः हमारा हो जाएगा। मानव की यह तुच्छ मानसिकता है कि वह दूसरे को भी अपनी तरफ नीचे खींच लेना चाहता है ताकि स्वयं के अहम् को संतुष्ट कर सके और अपनी बुराई की ग्लानि को छिपा सके कि मात्र मैं ही ऐसा नहीं हूँ। किसी आदर्श व्यक्ति की तरह बनने की बजाय दूसरे को अपने जैसा बनाने की बात ज्यादा सरल लगती है। परन्तु उनका यह स्वार्थ, ऐसे कई युवाओं का भविष्य अंधकारमय बना देता है जिनका अभी स्वर्णकाल है। ऐसी संगति में जाने से पहले  युवा ये जान लें कि कुसंग का क्षणिक आकर्षण व झूठी वाहवाही बर्बाद तो कर देगी पर बर्बाद होने के आबाद करने ये कुसंगी फिर कभी नहीं आएंगे। नशे से बर्बाद व्यक्ति का कोई मित्र उसकी बीमारी व गरीबी का सहारा बनने नहीं आता। हज़ार कुसंगी मित्रों से, मित्रों  का न होना अच्छा है। अपने मित्र स्वयं बन जाएं, अपनी अच्छी सोच व लक्ष्य की लगन से मित्रता करें, भगवान से मित्रता करें। 


कमज़ोरियाँ 

व्यक्ति मानसिक रूप से कितना सशक्त व साहसी है, इसका पता समस्याओं के आने पर ही चलता है। जीवन की कोई असफलता, विरोध, अपमान या दुर्घटना कई बार व्यक्ति को घायल कर देती है, वह दुःख उसे पहाड़ जैसा दिखाई देता है। उस दुःख को जीत न पाने की स्थिति में वह व्यसनों का सहारा ले लेता है। यह एक मानसिक कमज़ोरी है। क्या शेर के सामने खड़ा शिकार आँखें बंद कर ले तो शेर गायब हो जाएगा? नहीं बल्कि उसका शिकार और भी सहजता से हो जाएगा। परिस्थितियों का सामना न कर पाने पर जो लोग नशे को अपनाते हैं, उनकी परिस्थितियां समाप्त नहीं होती, बस, नशे में कुछ देर के लिए समस्या भूल कर वे अपने को मुक्त महसूस करते हैं। पर होश आने पर लोगों के सामने हुई शर्मिंदगी और यथावत समस्या के दबाव को भुलाने के लिए और ही ज्यादा नशे में डूब जाते हैं। आवश्यकता थी अनुभवियों से ज्ञान-मार्गदर्शन लेने की, अच्छे चिंतन से अपने में  विश्वास जगाये रखने की, धैर्य और मेहनत की, परमात्मा की याद से आत्मबल बढ़ाने की परन्तु तरीका अपनाया गया,बड़ी समस्या का निर्माण कर, छोटी समस्या मिटाने का। तो संकल्प करें स्वयं को शक्तिशाली बनाने का। प्यासा पानी ढूंढ ही लेता है और जिज्ञासु ज्ञान और समाधान। 


कुतर्क 

ऊपर दिए गए कारणों में यह कारण(कुतर्क) ऐसा है जिसका सबसे ज्यादा दोष स्वयं व्यक्ति पर होता है क्योंकि इस कारण के पीछे परिस्थिति का दबाव नहीं है। कई बार गलती को समझते हुए भी अपने शौक के लिए व्यक्ति कुतर्क को ढाल बनाता है। मसलन वो कहता है कि आप हमें समझाते हो कि व्यसनों से रोग और अपराध बढ़ते हैं लेकिन अमुक व्यक्ति तो सुपारी का दाना भी नहीं लेता था परन्तु फिर भी अल्पायु में ही हार्टफेल से मर गया या उसे कैंसर हो गया। मैं नशा करता हूँ पर किसी का बुरा नहीं करता। अमुक व्यक्ति तो बड़ा धार्मिक बनता है लेकिन उसके कर्म बड़े ही बेईमानी वाले हैं। समझने की बात है कि नशों के अलावा भी बिमारियों के कई अन्य कारण होते हैं। अपनी अच्छाई का हवाला देकर, अपनी बुराई को सही ठहरा देना कहाँ उचित है? कई कहते हैं, यह हमारा व्यक्तिगत मामला है पर कैसे? सिगरेट का जो धुंआ आप हवा में छोड़ते है, वह दूसरों को श्वासों में न पहुंचे, क्या यह आपके हाथ में है? तम्बाकू खाकर आप जो जगह-जगह पर थूकते हैं, क्या वे दाग आप खुद धोते हैं? शराब की जो दुर्गंध आपके मुँह से आती है, क्या आप उसे फैलने से रोक लेते हैं? व्यसनों से मिलने वाले दुःख व ग्लानि से क्या परिजनों को बचा लेते हैं? क्या इस शरीर की संभाल करना आपका व्यक्तिगत कर्तव्य नहीं है? तो कुतर्कों का धोखा स्वयं को न दें, नहीं तो ये आत्मग्लानि और पश्चाताप का कारण बनेंगे। कोई कहते हैं कि ये चीज़ें भगवान ने बनाई ही क्यों? इसका उत्तर ईश्वर प्रदत्त ज्ञान द्वारा मिलता है कि ये व्यसन परमात्मा ने बनाये ही नहीं बल्कि इनकी रचना हमारी तृष्णाओं व इच्छाओं के कारण प्रकृति में स्वतः होती है। फिर हम इन्हें अपनाते हैं। सतयुग में तम्बाकू आदि नशीले पदार्थ पैदा ही नहीं  होते क्योंकि वहाँ दैवी संस्कृति है और देवताओं की सभी इच्छाएं पूर्ण सात्विक एवं नियंत्रित होती हैं। मध्यकाल में विकारों की प्रवेशता के कारण जगने वाली तामसी इच्छाओं के आकर्षण से ही प्रकृति में भी तामसी पदार्थ पैदा होने शुरू होते हैं और फिर हम इन्हें अपनाते तो स्वेच्छा से ही हैं न!  

ॐ शांति!!

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