पवित्र बनो,योगी बनो|Power of Purity

पवित्र बनो,योगी बनो 


अग्नि की लपटें हमेशा परमाग्नि 'सूरज ' से योग हेतु ऊपर की ओर लपलपाती है; नदियां हमेशा समुद्र की दिशा में प्रवाहित हो कर उससे संयोगित होने को आतुर  हैं; उड़ते हुए मिटटी के दिशाहीन कण अंत में अपने मूल स्रोत ज़मीन से युक्त-संयुक्त हो कर ही शांति पाते हैं; विषैली वायु वनस्पति जगत का संसर्ग पाकर स्वच्छ होती रहती है और आकाश अपनी विशालता को कभी भी संकुचित करता नहीं है।

वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार आकाश में अनंत विस्तार तक जो नक्षत्र सितारे फैले हुए हैं वे कुल आकाश के मात्र 0.00000000000001  प्रतिशत स्थान में काबिज़ हैं। यही कारण है कि इनके आपस में टकराने की सम्भावना समाप्त हो जाती है। मनुष्यों की सोच भी यदि आकाश की तरह विशाल हो तो उनका आपस में मतभेद या टकराव नहीं हो सकता। ये पांच तत्व जड़ होते हुए भी कुदरती नियमों को भूल चुकी मनुष्यात्माओं को जब स्वयं परम पावन 'शिव' राजयोग सिखाने आते हैं, तब भी वे अलबेलापन दिखाती हैं।

 शिव कहते हैं, 'पवित्र बनो , योगी बनो' और मनुष्य कहते हैं 'बस कृपा दो, आशीर्वाद कर दो। ' जहां 'काम' का उफान और संकल्पों का तूफ़ान हो, वहां योग की स्थिति कैसे बन सकती है ? उफनते दूध को गिरने से बचाने के लिए या तो जल डालने का या वायु फूंकने का या अग्नि हटाने का या बड़े बर्तन में दूध उबालने का कर्म करना होता है।
उसी प्रकार उबल रहे मन को शांत करने के लिए या तो ज्ञान जल के छींटे डाले जाते हैं या वायु में मनसा सेवा, शुभ-भावना, शुभ-कामना के प्रकम्पन फ़ैलाने होते हैं या फिर मन को 'लौकिक-पसारा'से निकाल कर शिव बाबा से योग की अगन में मगन करना होता है या बुद्धि रूपी आकाश को विशाल बनाना होता है।
आज योग एक फैशन की तरह देहधारियों के द्वारा सीखा व सिखाया जा रहा है, जो पावन नहीं बनाता। आत्मा व परमात्मा से अनभिज्ञ रहते हुए किया गया कोई भी योगाभ्यास सांसारिक दुखों व अशांति से मुक्त कर नहीं सकता। 

यह आत्मा की योग-शक्ति का ही कमाल है जो कि चैतन्य आत्मा जब परमात्मा से योगयुक्त होती है तो आत्मा भी ज्ञान, गुण व शक्तियों से चैतन्य हो उठती है।
 ऐसी चैतन्यता परमात्मा के कपोल-कलिप्त स्वरुप से योग लगाने से या जड़ मूर्तों से योग लगाने से नहीं आती। 

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