LOVE OR FEAR OF GOD? परमात्मा से प्यार या भय? IS GOD'S LOVE UNLIMITED & INEXHAUSTIBLE?

परमात्मा से प्यार या भय?


हमें कोई प्यार करे-ऐसी इच्छा और तमन्ना तो हर एक को होती है परन्तु प्रेम की अच्छी समझ और परख किसी विरले को ही हो सकती है। वास्तव में प्रेम बिना जीवन नीरस और निस्सार है। जिसने जीवन में प्रेम का रास चखा ही नहीं है,ऐसा व्यक्ति इस जगत में सबसे ज़्यादा दीन और दयनीय है। अहंकार जितना ज्यादा बढ़ता है उस हिसाब से व्यक्ति अपने आप कठोर बनता जाता है। अहंकार जितना कम होगा उतना मानव मन सरल और विमल बन जाएगा। अहंकार-शून्य होने पर मनुष्य का दिल प्रेममय और पारदर्शी बन जाता है। फिर उसमें कोई अपेक्षा, शर्त, या रूकावट नहीं होती। 

अपार है परमात्मा का प्यार 

जिसको हम चाहें, उसे सम्पूर्ण मुक्ति दें, तब ही प्रेम जिवंत रहकर विकसित हो सकता है। प्रेम में स्वतन्त्र तभी संभव होती है जब प्रेमपात्र पर श्रद्धा और भरोसा होता है। परमात्मा भी प्राणी मात्र को सम्पूर्ण स्वतंत्रता देता है। उसकी कोई शर्त या अपेक्षा ही नहीं है। ये ही कारण है कि हम संसार में कितना भी भटकें, परम विश्वास तो परमात्मा की गोद में, उनके साथ मनोमिलन में ही अनुभव होता है। परमात्मा का प्यार अपार है। 

परमात्म कार्य में गणित की बजाय कल्याण भाव 

जैसे माता कमज़ोर बच्चे का अधिक ध्यान रखती है, ऐसे ही परमात्मा हम पतित, भ्रष्ट मनुष्यों पर रहम करता है और स्वयं सृष्टि पर अवतरित होकर हमें विकारों की दलदल से निकाल पावन बनाता है। परमात्मा पिता तो प्यार का सागर, रहमदिल, परम करुणावान है। वह हमारी छोटी-मोटी भूलों का हिसाब नहीं रखता है। ऐसा हिसाब तो मानवीय मन में चलता है। परमात्मा का कार्य गणित से नहीं, कल्याण-भाव और रूहानी प्यार से चलता है। 

जो देंगे,वही मिलेगा 

संसार में कर्म और कर्मफल का सिद्धांत अटल है। कर्म खुद ही परिणाम लाने वाला बन जाता है। इसलिए अगर हम जीवन में दुःख-अशांति के फल खा रहे हैं तो उसका अर्थ यह है कि जाने-अनजाने गलत कर्म के बीज हमारे द्वारा बोये जा रहे हैं। इसलिए अगर हमें सदाकाल का सुख, आनंद चाहिए तो हम अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाएं। जैसे फल हमें चाहिए,वैसे फल देने वाले बीज हमें बोने होंगे। जो हम देंगे,वही हमें मिलेगा। तो हम स्पष्ट समझ लें की परमात्मा कोई हमारे कर्मों को हर घडी देखते नहीं रहते हैं, न ही उनका हिसाब रखते हैं। वो तो है ही सदा पावन, सदाशिव। 

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