नाराज़गी और असंतुष्टता (अंतर,कारण और निवारण) | Heartburn and dissatisfaction (difference, cause and prevention)

नाराज़गी और असंतुष्टता(अंतर,कारण और निवारण)


नाराज़गी और असंतुष्टता में अंतर


हमारे विचार में असंतुष्टता, नाराज़गी की जननी है परन्तु असंतुष्टता से नाराज़गी अधिक उग्र और क्लेषकारी है। यह एक मानसिक ताप है। जैसे किसी व्यक्ति का तापमान सदा 99 प्रतिशत रहता हो, वैसे ही नाराज़गी वाले मनुष्य का मन भी थोड़ा बहुत तपा हुआ ही रहता है गोया यह एक मानसिक ज्वर है, एक प्रकार का तपेदिक रोग है। यदि हमारे साथ किसी का व्यव्हार मर्यादापूर्ण न हो अथवा हमारे साथ कोई कार्य करने वाला ठीक से कार्य न करता हो तो इस परिस्थिति में असंतुष्टता का उद्रेक होने की सम्भावना होती है परन्तु, उस व्यक्ति से नाराज़ हो जाना स्वयं अपनी ही कमज़ोरी के कारण होता है। असंतुष्टता को जागृत करने में तो दूसरा व्यक्ति भी भागिदार होता है क्योंकि उसी की रीति-नीति और उसी के स्थिति-कृति अथवा उसी की बातचीत मर्यादा का उल्लंघन करने वाली होती है परन्तु नाराज़गी का होना या न होना स्वयं हम पर निर्भर करता है। 

नाराज़गी और असंतुष्टता का कारण और निवारण 

अब प्रश्न यह है कि नाराज़गी अथवा असंतुष्टता का इलाज क्या है? हमारा यह विचार है की किसी मनुष्य में मुख्य रूप से दो कारणों से ही असंतुष्टता होती है। एक कारण तो प्रायः यह हुआ करता है की आप जिस व्यक्ति से सहयोग, सहायता,सहानुभूति,सहकारिता,स्नेह और सम्मान की आशा करते हैं, वह उस आशा के अनुसार पूरा नहीं उतरता और दूसरा कारण यह हुआ करता है कि आप जिस व्यक्ति से सभ्य-व्यव्हार, मर्यादा,शालीनता, अनुशासन, सरलता और सच्चरित्र की आशा करते हैं, आपकी वह आशा उससे पूरी नहीं होती। इन कारणों से हमारे मन में असंतुष्टता और उससे उद्भूत होने वाली नाराज़गी तभी पैदा होती है जब हम अग्रलिखित तीन बातों को समय पर अपने मन में स्थिर नहीं कर पाते-

1) यह कि हरेक मनुष्य स्वयं कई उलझनों में उलझा हुआ है, चिंताओं में डूबा हुआ है, परिस्थितियों से पीड़ित है, कमियों और कमज़ोरियों से जकड़ा हुआ है। उसके अपने विचार अस्थिर हैं और तन से, मन से, धन से तथा बुद्धि से उसके सामर्थ्य की सीमा है। जब हम उसकी इन परिस्थितियों की उपेक्षा करके उससे आशा करते हैं तो मानो जान-बूझकर अपने को असंतुष्टता का शिकार बनाते हैं। 

2)हम यह भूल जाते हैं कि इस समय सभी मनुष्यों की तमोप्रधान, मर्यादाविहीन, माया-अधीन, मानसिक चंचलता, अस्थिरता तथा संस्कारों की अशुद्धता अवस्था है।  जो इससे ऊँचे उठ चुके हैं वे भी अभी सम्पूर्ण नहीं बने हैं। यदि वर्तमान समाज तथा उसके व्यक्तियों की दशा का ज्ञान हमारी बुद्धि में स्थिर रहे तो हम नाराज़गी से बचे रह सकते हैं। 

3) यदि हमें यह बात विस्मृत न हो कि हमारा हरेक व्यक्ति से कर्म-फल भी है और हमारा व्यक्तिगत कर्म-फल भी हमारे साथ है और कि हरेक मनुष्य शुद्ध रूप से, अशुद्ध रूप से तथा शुद्ध एवं अशुद्ध मिश्रित रूप से किसी न किसी अंश में स्वार्थी भी है तो फिर हम नाराज़गी के उग्र रूप से स्वयं को बचाये रख सकते हैं। 

आप का हार्दिक शुक्रिया इस पोस्ट को पढ़ने के लिए। अगर पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर ज़रूर करें। 

यह भी पढ़ें:



Post a Comment

Previous Post Next Post