गुणों की गहराई | Depth of QUALITIES

गुणों की गहराई 

सादगी 

आपने देखा होगा, कई लोग कहतें हैं कि हम औपचारिकता अथवा तकल्लुफ में विश्वास नहीं करते। वे मन में सोचते हैं कि हम तो मिलनसार हैं, स्नेही हैं और दिखावे से दूर हैं।  वे किसी के आने पर न तो ठीक से अभिनन्दन करते हैं, न उसके जाने पर शिष्टता को व्यवहारित करते हैं। इस प्रकार उनके मन में जो दूसरों के प्रति आदर-भाव की कमी है अथवा शिष्टता का जो अभाव है,उसको न समझते हुए वे कहते हैं कि हम तो सबसे घुलमिल जाते हैं; हम में आत्मीयता तथा बंधुत्व है। अतः अनौपचारिकता के साथ-साथ उनमें मर्यादा की कमी,शालीनता का आभाव, अपेक्षित सत्कार करने के प्रति कर्तव्यविमुखता करने के संस्कार भी घुन की तरह रूहानियत को खोखला करते चले जाते हैं। अतः हमें सदा अपने ऊपर ध्यान देना चाहिए की सादगी और आत्मीयता के साथ-साथ दूसरों को आदर-सत्कार देने का गुण भी होना चाहिए वरना उस रूखी सादगी और थोथी आत्मीयता से हम कई लोगों को बेगाना बना लेंगे और दिव्यता की बजाय हम रुक्षता तथा गंवारूपन की सीमा में प्रविष्ट हो जाएंगे। 

दूसरों का सत्कार और आतिथ्य 

ऐसे भी लोग हैं जो दूसरों का आदर-सत्कार करते हैं और उनसे मधुर वचन भी बोलते हैं परन्तु वास्तव में उनके मन में उनके व्यव्हार के मूल में उस व्यक्ति से अपना काम निकालने का ही भाव समाया होता है। इसलिए उनका यह दिव्य गुण तो स्थिर हो नहीं पाटा, साथ में स्वार्थ और चाटुकारिता के घुन भी उनको खाने लगते हैं। 

गंभीरता 

और देखिये। एक व्यक्ति आजकल कम बोलता है। हम जब उसे कहते हैं कि ' आजकल तो आप प्रायः शांत रहते हैं ' तो वह कहता है,' हमें मुँह-फट बनना अच्छा नहीं लगता,हम तो अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं। जहाँ जितनी आवश्यकता होती है, वहाँ उतना ही बोलते हैं। हम इधर-उधर हर एक जगह बात करना पसंद नहीं करते। अधिक बोलने का फायदा ही क्या है? गंभीर रहना ही अच्छा है। ' वह सोचता है कि अब मैं अंतर्मुखी बनता जा रहा हूँ और दिव्य गुणों की धारना के पुरुषार्थ में लगा हूँ। अब,निःसंदेह, गंभीरता तो एक अच्छा गुण है परन्तु किसी-किसी मनुष्य का कम बोलना 'अंतर्मुखता ' और ' गंभीरता ' के कारण नहीं होता बल्कि इस कारण होता है कि वह कई लोगों से रूठा हुआ होता है। रुष्टता के कारण उसके मन में घृणा की लहर होती है; इसलिए उस मूड में वह किसी से भी बात नहीं करना चाहता। दूसरे शब्दों में उसका मौन अथवा अलप-वक्तृत्व गंभीरता रूपी दिव्यता पर आधारित नहीं होता बल्कि रूठना रूपी संस्कार पर होता है। तो यह बात निर्विवाद है कि हम गंभीरता तथा अलप वक्तृत्व का गुण धारण करें परन्तु साथ में यह देख लें कि उसे रुष्टता का घुन तो नहीं लगा। 

स्पष्टवादिता 

लोगों के संपर्क में आने से, आप जानते ही होंगे की कुछ लोग कहते हैं, हम तो सरल स्वाभाव के हैं।  जो बात जैसी होती है, हम तो उसे सच्चाई से साफ़-साफ़ कह देते हैं। हम झूठ क्यों बोले; हमें किसी का डर थोड़े ही है? हम तो अंदर-बाहर से एक हैं। अब निस्संदेह स्पष्टवादिता, सच्चाई और मानसिक सफाई तो दिव्य गुण हैं परन्तु हम देखते हैं कि कहीं-कहीं स्पष्ट वक्तृत्व रुपी गुण के मूल मे कई बार गंभीरता का अभाव, धैर्य की कमी, दूसरे को गलत सिद्ध कर उसकी मान-हानि करने का विचार, अपनी ही बात को सत्य सिद्ध करने का अहम् भाव और इस प्रकार के अन्य कई त्याज्य-भाव समाय होते हैं। ये सब घुन उस गुण को शुद्ध रूप में विकसित नहीं होने देते। अतः जहाँ उस व्यक्ति के जीवन मे बेधड़क होकर बात करने का गुण पनपता है वहाँ उदंडता, अभद्रता, कटुता, विवादप्रियता आदि घुन अथवा अवगुण भी पनपते हैं क्योंकि कई पुरुषार्थी इस बात से लापरवाह होते हैं कि  उनकी इस स्पष्टवादिता का आधार दिव्यता पर नहीं है। हमें चाहिए की हम देखें कि हमारी स्पष्टवादिता में कटुता, उदंडता या दूसरे को मान-हानि पहुंचाने का भाव तो नहीं है। 

सन्तुष्टता 

इसी प्रकार, कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति या परिस्थिति में कहता है कि " मैं तो संतुष्ट हूँ। " जब कोई उससे पूछता है कि "आप कैसे हैं", तो वह कहता है, "मैं ठीक हूँ। " परन्तु, गंभीरता से विचार करने पर मालूम होता है कि उसकी इस सन्तुष्टता की बुनियाद में आलस्य, पराक्रम की कमी अथवा कृत्रिम सन्तुष्टता होती है। अपने मन में तो वह व्यक्ति जानता है कि जैसा पुरुषार्थ वह कर रहा है, उससे वह सूर्यवंश का स्वराज्य पद प्राप्त नहीं कर सकता तो भी यह सोच कर कि चन्द्रवंश का स्वराज्य पद भी कोई काम तो नहीं है, वह स्वयं को दम-दिलासे से संतुष्ट कर लेता है। ऐसी सन्तुष्टता न उसे कल्याण की पराकाष्ठा पर ले जाती है, न ही दूसरों को दिव्यता की ओर  प्रेरित करती है। सन्तुष्टता के साथ हमें पराक्रमी, उद्यमी, तीव्र पुरुषार्थी और परोपकारी भी होना चाहिए। यदि हमारी सन्तुष्टता इनसे रहित होगी तो उसे 'पुरुषार्थहीनता और स्वार्थ' का घुन लगा होगा और वह सन्तुष्टता हमारी उन्नति तथा बहुमुखी विकास में बाधा होगी। वह दिव्यगुणों के उत्कर्ष की ओर ले जाने वाली होगी। 

दूसरों का सुधार करने का संकल्प 

कुछ लोग कहते हैं कि  'अमुक व्यक्ति की अवस्था उसकी कृति ठीक नहीं है परन्तु वह समझता अपने को बहुत कुछ है। अब हम उसे सीधे रास्ते पर लाएंगे अथवा हम अमुक महान व्यक्ति से बात करके इसे ठीक करा देंगे। ' अब देखने में तो ऐसा लगता है कि इनकी भावना  सुधार करने की ही है परन्तु कोई-कोई व्यक्ति जो विधि अपनाते हैं उससे मालूम होता है कि  उसके मूल में कुछ और भाव भी मिश्रित होता है। परिणाम यह होता है कि वे दूसरों को तो ठीक करना चाहते हैं परन्तु चलते-चलते स्वयं दूसरों की निंदा के धंधे में फंस जाते हैं। दूसरों का सुधर करने की कामना करते हुए ऐसे लोगों का अपना सुधार पीछे रह जाता है। इसका कारण यह है कि उनकी इस भावना के मूल में दूसरों के कल्याण की भावना नहीं होती बल्कि अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने अथवा दूसरे को तुच्छ सिद्ध करने की सूक्ष्म इच्छा होती है। अतः हमें यह देखना चाहिए कि किसी के सुधार के लिए जब हम किन्ही बड़ों को उसका समाचार देते हैं तो उस समय हमारे मन में उसके कल्याण की ही भावना होती है या उसकी ग्लानि करने का भी भाव भरा है। हमें गुणों को धारण करना चाहिए और घुन को निकाल देना चाहिए। 

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