प्रश्न हमारे उत्तर दादी जी के| अवस्था कैसे अच्छी करें?

प्रश्न हमारे उत्तर दादी जी के


प्रश्न: समझकर चले तो अवस्था अच्छी हो जाती है?

मेरी अच्छी अवस्था तब हुई है जब मैं ये समझके चलती हूँ कि  पांच अंगुली हैं,इनमें कोई छोटी है, कोई मोटी है, बराबर नहीं हैं फिर भी इजी है। नो प्रॉब्लम क्योंकि पास्ट इस पास्ट करके सबको मिलाके चलते हैं। कोई छोटी बुद्धि वाले, कोई अच्छी बुद्धि वाले, कोई मोटी बुद्धि वाले हैं परन्तु फिर भी सब बाबा के बच्चे हैं। सब मिल करके बाबा के घर में, बाबा की याद में बैठते हैं तो सब ठीक रहता है, सब अच्छा लगता है। 

बाबा ने इस ज्ञान मार्ग को बहुत सहज मार्ग बना दिया है। एक मिनट के लिए सब अपने आपको देखो कि मैं ज्ञानमार्ग के रास्ते में आ गयी हूँ तो भाग्यवान हूँ। भले लौकिक में रहते हैं लेकिन हम सब खुशनसीब हैं जो बाबा के करीब हैं क्योंकि यहाँ इस पढ़ाई में कमाई है, पढ़ाई के बाद कमाई नहीं है। 
लौकिक भाई का फ्लैट वरली में था, उसका नाम मोहन था। बाबा उसको प्यार करता था। मैं सोचती थी, बाबा इसको क्यों प्यार करता है, ऐसा इसमें क्या है ! उस समय बाबा ने कहा था, यह स्पेशल मेरा प्यारा बच्चा है। बाबा को प्यारा कौन लगता है? वरली में मैं जब सागर किनारे पैदल करती थी तो अच्छा लगता था। वहाँ पर कभी बैंच पर बैठ जाती थी तो कई बुज़ुर्ग भी वहाँ पैदल करते थे। मैं अकेली ही सफ़ेद कपड़ों में दिखाई पड़ती थी। कोई आके मेरे बाजू में बैठ जाते थे। फिर पूछते थे, तुम कौन हो? कहाँ से आती हो? मैं कहती थी, मेरा नज़दीक में यहां घर है। फिर अच्छी सेवा हो जाती थी। कइयों का मन अभी तक थोड़ा मोह में फंसा हुआ है। काम, क्रोध नहीं है, थोड़ा लोभ, थोड़ा मोह है। अहंकार नहीं है क्योंकि अहंकार को सभी ने मार डाला है ना। तो जिसको सच्ची बातें सुननी हों वो भगवान के मुख से सुनो, तो राज़ी ख़ुशी रहेंगे क्योंकि बाबा की बातें एक्यूरेट होती हैं। 

शिव के साथ हमारी भी पूजा हो रही है ना, अभी हम देखते हैं। हम पूज्य भी बनते हैं तो पुजारी भी बनते हैं। मंदिर भी हमने ही बनाये हैं। मुरली सुनने के लिए अभी इतने बड़े-बड़े हॉल भी बनाये हैं। बाबा ने ज्ञान का तीसरा नेत्र देके सबको त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ बना दिया है। चक्र, त्रिमूर्ति और झाड़ के चित्र को देख बुद्धि में यह आता है कि साक्षी हो करके, बाबा को साथी बनाये इस बेहद वैरायटी ड्रामा में पार्ट बजाना है क्योंकि वैरायटी पार्टधारी हैं इसलिए सब बराबर नहीं हैं, नम्बरवार हैं। 

प्रश्न: संगम पर बड़ा भाग्य कोन-सा है?

उत्तर: बाबा ने सिखाया है,बच्चे , कोई  भी बात हो, यह क्या हुआ, कैसे हुआ, कभी भी ऐसे शब्द आप मुख से नहीं बोल सकते हैं। यह मुख अभी बाबा के महावाक्य बोलने के लिए है। कानो से बाबा के महावाक्य सुनते हैं, मुख से सुनाते हैं और आँखों से बाबा दृष्टि देकर न्यारा और प्रभु का प्यारा बना देते हैं।बाबा के प्यार में न्यारा  भी बनते हैं और प्यारा भी बनते हैं। संगमयुग कितना अच्छा है, संगमयुग में बाबा ने चुन-चुन करके अपने गले की माला बना दिया है। सारे कल्प में बाबा कहने का जो भाग्य मिला है, वो अभी मिला है, फिर कल्प के बाद मिलेगा। संगमयुग भले ही छोटा है पर बड़े काम का है। कलियुग से जा रहे हैं, सतयुग में आने  के लिए। हम है सच्चे, एक-दो से न्यारे, बाबा के प्यारे।  

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