सम्भालिये अपने संग को | देहभान , सम्बन्ध-संपर्क का ,वस्तुओं में आकर्षण अथवा व्यर्थ संकल्पों का दोष

सम्भालिये अपने संग को 



कहा जाता है जैसा संग वैसा रंग। यदि किसी व्यक्ति के बारे में जानना हो तो उसकी सांगत को देखो। हम आत्माओं की मन बुद्धि जब परमात्म याद को भूल किसी अन्य की और आकर्षित होती है तो वह संगदोष कहलाता है। केवल एक परमपिता परमात्मा ही सर्वगुणों के सागर हैं। उनके संग से ही हम सर्वगुण संपन्न बनते हैं। शेष कोई भी संग का रंग हमें संगदोष में लाकर आत्मिक अवनति का  बनता है। संगदोष किस-किस तरह से हमें लग सकता है तथा उससे बचने का मार्ग क्या है, इस पर आज हम करेंगे। 

देहभान रुपी संगदोष  

स्वयं को देह समझना या औरों के प्रति दैहिक दृष्टि, वृत्ति रख उनसे व्यवहार करना, यह सभी विकारों की जड़ है। इसी ने हमें द्वापरयुग से उतरती कला में लाया है। इससे बचने हेतु स्वयं को आत्मा समझ, आत्मिक दृष्टि रख व्यव्हार में आने का अभ्यास करना है। 

सम्बन्ध-संपर्क का दोष 

स्थूल रूप से या सूक्ष्म रूप से मित्र-सम्बन्धियों आदि के प्रति मोहवश लगाव-झुकाव होना, किसी की विशेषताओं के प्रभाव में आ जाना या किसी की कमी-कमज़ोरियों को देख उनके प्रति नफरत आदि नकारात्मक भाव रखना, ये सब दोष भी आत्मा को उजला नहीं होने देते। इनसे बचने हेतु सर्व संबंधों का रस एक परमपिता परमात्मा से अनुभव करना है। यदि किसी एक सम्बन्ध से भी परमात्म प्यार छूट गया तो वह सम्बन्ध मन-बुद्धि को खींचता रहेगा। 

वस्तुओं में आकर्षण रूपी संगदोष 

किसी भी वास्तु में आसक्ति होना या ज़रूरत न होने पर भी उसका अभाव महसूस करना या सुख-सुविधाओं में आत्मा का फंस जाना, वस्तुदोष है। इस दोष से बचने के लिए बार-बार बाबा से की हुई प्रतिज्ञा कि जहाँ बिठाओ, जो खिलाओ, जैसे रखो, को स्मृति में लाते रहें। 

अन्न्दोश 

अत्यधिक चाय-कॉफ़ी पीना, तली हुई और अधिक मिर्च मसालेदार भोजन सामग्री, गरिष्ठ खाद्य अचार आदि खाना अन्न्दोश माना जाता है। ज़रूरत से ज्यादा खाना, आसक्ति से खाना, छिपाकर खाना, बार-बार खाना, पाप की कमाई से खरीदा हुआ खाना-ये भी अन्न्दोश माने गए हैं। इनसे बचने के लिए शुद्ध कमाई से बना, प्रभु स्मृति में, सादा, सात्विक,शिवबाबा को स्वीकार कराया हुआ भोजन खाएँ।  

बीती बातों का संगदोष 

बीती हुई अच्छी-बुरी, सुखद-दुखद बातों का बार-बार स्मरण, वर्णन भी संगदोष है। इसके साथ-साथ वर्तमान में होने वाले विकर्मों की छाप भी शिवबाबा की याद में बुद्धि को एकाग्र होने नहीं देती। अतः बीती सो बीती कर, शिवबाबा को सच्चाई से प्रतिदिन का पोतामेल देते हुए इस दोष से मुक्त हो जाएँ। 

व्यर्थ संकल्पों का दोष 

जिस समय जिन संकल्पों की आवश्यकता नहीं या जो संकल्प निष्फल हैं, चाहे वर्तमान परिस्तिथि या भविष्य की कल्पनाओं के हों, ऐसे संकल्प भी उन्नति में विघ्न रूप बन जाते हैं। इसके लिए निरंतर महान विचारों में रमण करने का अभ्यास बनाएँ तथा विचारों पर नियंत्रण शक्ति को बढ़ाएं। 

पुरानी आदतों या स्वभाव संस्कार का संगदोष

पुराने आसुरी स्वभाव संस्कार या आदतें हममें नहीं होनी चाहिए। फिर भी बार-बार ये कर्म में आ जाते हैं। इस प्रकार ये हमें ईश्वरीय संग में ले जाते हैं। ऐसी आदतों और संस्कारों को पहचान कर, दृढता से बदलकर, ईश्वरीय आदतें विकसित करें।

डिजीटल वर्ल्ड का संगदोष

ज़रूरत न होने पर भी टी.वी ., मोबाइल, इन्टरनेट, सोशल मीडिया आदि का इस्तेमाल करना, अत्यधिक समय तक इस्तेमाल करना अथवा सेवार्थ के बजाए इन्द्रियों की तुष्टि के लिए उपयोग करना भी संगदोष है, जो पतन के निमित्त बनता है। इनका इस्तेमाल कम से कम हो और परमार्थ के लिए ही हो।

सेवा में सफलता व अपनी विशेषताओं का संगदोष

अपनी विशेषताओं का अभिमान व योग के समय भी सेवाओं में बुद्धि का भटकना, परमात्मा से योग तोड़ देता है। इससे बचने हेतु स्वयं को निमित्त समझ, करनकरावनहार करा रहा है, यह स्मृति पक्की करते जाएं।

  • प्रकृति का संगदोष
यदि किसी विशेष स्थान पर जाने या बैठने से ही योग लगता है, वहाँ न जा पाएं तो बुद्धि में हलचल होती है, संकल्प चलते हैं, यह भी संगदोष की निशानी है। हमें चलते-फिरते, उठते-बैठते, जहाँ हैं, जिस परिस्थिति में है, वहीं शिवबाबा की याद में रहने का अभ्यास करना है।
उपरोक्त सभी तरह के संगदोष मन-बुद्धि को भटकाते हैं। भटकाव से बचने के लिए हमें कन्ट्रोलिंग और रूलिंग पावर बढानी है। साथ ही त्याग, तपस्या और वैराग्य का वातावरण निर्मित करना है। त्याग देहभान का, तपस्या मनमनाभव रहने की तथा वैराग्य सम्पूर्ण पुरानी दुनिया से, दुनियावी लोगो से व वस्तुओं से रखना है।


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